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रामनाम

२० रामनाम

पाई है। और मेरा यह दावा है कि रामनाम सभी बीमारियों की, फिर वे तन की हो, मन की हो या रूहानी हो, एक ही अचूक दवा है। जिसमें शक नही कि डॉक्टरो या वैद्यो से शरीर की बीमारियो का इलाज कराया जा सकता है। लेकिन रामनाम तो आदमी को खुद ही अपना वैद्य या डॉक्टर बना देता है, और उसे अपने को अन्दर से नीरोग बनाने की संजीवनी हासिल करा देता है। जब कोई बीमारी अधिक हद तक पहुँच जाती है कि उसे मिटाना मुमकिन नही रहता, उस वक्त भी रामनाम आदमी को उसे शान्त और स्वस्थ भाव से सह लेने की ताकत देता है।” उन्होंने और कहा “जिस आदमी को रामनाम मे श्रद्धा है, वह जैसे-तैसे अपनी जिन्दगी के दिन बढ़ाने के लिए नामी-गरामी डॉक्टरो और वैद्यो के दर की खाक नही छानेगा और यहाँ से वहा मारा-मारा नही फिरेगा । रामनाम डॉक्टरो और वैद्यो के आगे हाथ टेक देने के बाद लेने की चीज भी नही। वह तो आदमी को डॉक्टरो और वैद्यो के बिना भी अपना काम चला सकने वाला बनाने की चीज है । रामनाम मे श्रद्धा रखनेवाले के लिए वही उसकी पहली और आखिरी दवा है।” हरिजनसेवक, २-६-१९४६

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ददारथ-नन्दन रामं

एक आर्यसमाजी भाई लिखते है • “ जिन अविनाशी राम को अपना ईश्वर-स्वरूप मानते है, वे दशरथ-नन्दन सीतापति राम कैसे हो सकते है? जिस दुविधा का मारा मै आपकी प्रार्थना मे बैठता तो हू, लेकिन राम धुन मे हिस्सा नही लेता । यह मुझे चुभता है। क्योकि आपका कहना तो यह है कि सब हिस्सा ले, और यह ठीक भी है। तो क्या आप ऐसा कुछ नही कर सकते, जिससे सब हिस्सा ले सके ?” सबके मानी मै बता चुका हू । जो लोग दिल से हिस्सा ले सके, जो एक सुर मे गा सके, वे ही जिसमे हिस्सा ले, बाकी शान्त रहे। लेकिन यह तो छोटी बात हुआी । बडी बात तो यह है कि दशरथ-नन्दन राम अविनाशी कैसे हो सकते है? यह सवाल खुद तुलसीदास जी ने उठाया था और उन्होने