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मेरा राम कौन?

आप लोग उस सर्वशक्तिमान भगवान की गुलामी मंजूर करे। जिससे कोई मतलब नहीं कि आप उसे किस नाम से पुकारते है। तब आप किसी इंसान के सामने घुटने नही टेकेगे। यह कहना नादानी है कि मैं राम - महज एक आदमी - को भगवान के साथ मिलाता हूँ। मैने कई बार खुलासा किया है कि मेरा राम खुद भगवान ही है। वह पहले था, आज भी मौजूद है, आगे भी हमेशा रहेगा। न कभी वह पैदा हुआ, न किसी ने उसे बनाया। जिसके लिए आप अलग धर्मो को बरदाश्त करे और उनकी इज्जत करे। मै खुद मूर्तियो को नही मानता, मगर मै मूर्ति पूजा की उतनी ही इज्जत करता हूँ, जितनी औरो की। जो लोग मूर्तियोको पूजते है, वे भी उसी एक भगवान को पूजते है, जो हर जगह है, जो उगुलि से कटे हुए नाखून मे भी है। मेरे ऐसे मुसलमान दोस्त है, जिनके नाम रहीम, रहमान, करीम है। जब मै उन्हे रहीम, करीम और रहमान कहकर पुकारता हूँ, तो क्या मै उन्हे खुदा मान लेता हूँ ?

हरिजनसेवक, २-६-१९४६

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ईश्वर कौन और कहां है?

ब्रह्मचर्यं क्या है, यह बताते हुए मैने लिखा था कि ब्रह्म यानी ईश्वर तक पहुचने का जो आचार होना चाहिये, वह ब्रह्मचर्य है। लेकिन जितना जान लेने से ईश्वर के रूप का पता नहीं चलता। अगर उसका ठीक पता चल जाय, तो हम ईश्वर की तरफ जाने का ठीक रास्ता भी जान सकते है। ईश्वर मनुष्य नही है। दरसल वह किसी मनुष्य मे उतरता है या अवतार लेता है, ऐसा कहे तो यह पूरा सत्य नही है। एक तरह से ईश्वर किसी खास मनुष्य मे उतरता है, ऐसा कहने का मतलब सिर्फ जितना ही हो सकता है कि वह मनुष्य ईश्वर के ज्यादा नजदीक है। जिसमे हमे ज्यादा ईश्वरपन दिखाई देता है। ईश्वर तो सब जगह हाजिर है। वह सबमे मौजूद है।

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