पृष्ठ:Ramanama.pdf/४८

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२८ उरुळीकांचनमें कुदरती उपचार कुदरती उपचारको दो पहलू है एक ईश्वरकी शक्ति यानी रामनामसे दर्द मिटाना और दूसरा, ऍसे उपाय करना कि दर्द पैदा ही न हो सके। मेरे साथी लिखते है कि काचन गावके लोग गावको साफ रखनेमे मदद देते है। जिस जगह शरीर-सफाई, घर-सफाई और ग्राम-सफाई हो, युक्ताहार हो और योग्य व्यायाम हो, वहा कम-से-कम बीमारी होती है। और अगर चित्तशुद्धि भी हो, तो कहा जा सकता है कि बीमारी असम्भव हो जाती है। रामनामके बिना चित्तशुद्धि नहीं हो सकती । अगर देहातवाले इतनी बात समझ जाय, तो वैद्य, हकीम या डॉक्टरकी जरूरत न रह जाय । काचन गावमे गाये नामको ही है। इसे मै कमनसीबी मानता हू। कुछ भैसे है, लेकिन मेरे पास जितने प्रमाण है, वे बताते है कि गाय सबसे ज्यादा उपयोगी प्राणी है। गायका दूध भी खानेमे आरोग्यप्रद है और गायका जो उपयोग किया जा सकता है, वह भैसका कभी नही किया जा सकता । मरीजोके लिए तो वैद्य लोग गायके दूधका ही उपयोग बतलाते है। इसलिए मै उम्मीद रखूगा कि काचनवासी उरुळीमे गायोका एक जूथ रखेगे, जिससे सब लोगोको गायका ताजा और साफ दूध मिल सके । सेहत अच्छी रखनेके लिए दूधकी बहुत ज्यादा जरूरत रहती है। कुदरती उपचारके गर्भमे यह बात रही है कि मानव-जीवनकी आदर्श रचनामे देहातकी या शहरकी आदर्श रचना आ ही जाती है और उसका मध्यबिन्दु तो ईश्वर ही हो सकता है। हरिजनसेवक, २६-५-१९४६