पृष्ठ:Ramanama.pdf/५०

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 ३० कुदरती इलाज और आधुनिक इलाज मेरा कुदरती इलाज तो सिर्फ गाववालोके और गावोके लिए ही है। इसलिए उसमे खुर्दबीन, एक्सरे वगैराकी कोई जगह नही । और न कुदरती इलाजमे कुनैन, एमिटिन, पेनिसिलिन-जैसी दवाइयोकी ही गुजाइश है। असमे अपनी सफाई, घरकी सफाई, गावकी सफाई और तन्दुरुस्तीकी हिफाजतका पहला स्थान है । और इतना करना काफी है। इसकी तहमे खयाल यह है कि अगर हर आदमी इस कलामे निष्णात हो सके, तो कोई बीमारी ही न हो । और, बीमारी आ जाय तो उसे मिटानेके लिए कुदरतके सभी कानूनो पर अमल करनेके साथ साथ रामनाम ही असल इलाज है। यह इलाज सार्वजनिक या आम नही हो सकता । जब तक खुद इलाज करनेवालेमें रामनामकी सिद्धि न आ जाय, तब तक रामनाम-रूपी इलाजको एकदम आम नही बनाया जा सकता । लेकिन पचमहाभूतोमे से यानी पृथ्वी, पानी, आकाश, तेज और हवामे से जितनी शक्ति ली जा सके, उतनी लेकर रोग मिटानेकी यह एक कोशिश है, और मेरे खयालमे कुदरती इलाज यही खतम हो जाता है। इसलिए आजकल उरुळीकाचनमे जो प्रयोग चल रहा है, वह गाववालोको तन्दुरुस्तीकी हिफाजत करनेकी कला सिखाने और बीमारोकी बीमारीको पचमहाभूतोकी मददसे मिटानेका प्रयोग है। जरूरत मालूम होने पर उरुळीमें मिलनेवाली जडी-बूटियोका इस्तेमाल किया जा सकता है, और पथ्य-परहेज तो कुदरती इलाजका जरूरी हिस्सा है ही । हरिजनसेवक, ११-८- १९४६ ४२