पृष्ठ:Ramanama.pdf/५४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।


४६ रामनाम हम मरिअम्मा देवीकी पूजा करते है और बहुतसे रोगी अच्छे हो जाते है। यह चीज एक करामात-सी लगती है । जहा तक पेट-दर्दकी बात है, बहुतसे लोग तिरुपतिमे देवीकी मन्नते मानते है। अच्छे होने पर उसकी मूर्तिके हाथ-पाव धोते है, और दूसरी मानी हुई मन्नते पूरी करते है। मेरी ही माकी मिसाल लीजिये । उनको पेटमे दर्द रहता था । पर तिरुपति हो आनेके बाद उनकी वह तकलीफ दूर हो गई । “ कृपा करके इस बात पर रोशनी डालिये और यह भी कहिये कि कुदरती इलाज पर भी लोग ऐसा ही विश्वास क्यो न रखे ? इससे डॉक्टरोका बार-बारका खर्च बच जायगा, क्योकि चॉसरके कहनेके मुताबिक डॉक्टरका तो काम ही है कि वह दवाई बेचनेवालेसे मिलकर बीमारको हमेशा बीमार बनाये रखे ।” जो मिसाले ऊपर दी गई है, वे न तो कुदरती इलाजकी ही है, और न रामनामकी ही, जिसको मैने इसमे शामिल किया है। उनसे यह पता जरूर चलता है कि कुदरत बहुतसे रोगियोको बिना किसी इलाजके भी अच्छा कर देती है । ये मिसाले यह भी दिखाती है कि हिन्दुस्तानमे वहम हमारी जिन्दगीका कितना बडा हिस्सा बन गया है। कुदरती इलाजका मध्यबिन्दु यानी रामनाम तो वहमका दुश्मन है। जो बुराई करनेसे झिझकते नही, वे रामनामका नाजायज फायदा उठायेगे । पर वे तो हर चीज या हर उसूलके साथ ऐसा ही करेगे । खाली जबानसे रामनाम रटनेसे इलाजका कोई सम्बन्ध नही । अगर मै ठीक समझा हू, तो जैसा कि लेखकने बताया है, विश्वास-चिकित्सामे यह माना जाता है कि रोगी अन्ध-विश्वाससे अच्छा हो जाता है। यह मानना तो ईश्वरके नामकी हसी उडाना है। रामनाम सिर्फ कल्पनाकी चीज नही, उसे तो दिलसे निकलना है। परमात्मामें ज्ञानके साथ विश्वास हो और उसके साथ-साथ कुदरतके नियमोका पालन किया जाय, तभी किसी दूसरी मददके बिना रोगी बिलकुल अच्छा हो सकता है। उसूल् यह है कि शरीरकी सेहत तभी बिलकुल अच्छी हो सकती है, जब मनकी सेहत पूरी-पूरी ठीक हो । और मन पूरा-पूरा ठीक तभी होता है, जब दिल पूरा-पूरा ठीक हो । यह वह दिल नही, जिसे डॉक्टर छाती जाचनेके यत्र (स्टेथोस्कोप) से देखते है, बल्कि वह दिल है जो ईश्वरका घर है । कहा जाता है कि अगर कोई अपने अन्दर परमात्माको पहचान ले, तो एक भी गन्दा या फजूल खयाल मनमे नही आ सकता ।