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 विश्वास-चिकित्सा और रामनाम ४७

जहॉं विचार शुद्ध हो, वहा बीमारी आ ही नहीं सकती । एसी हालत को पहुचना शायद कठिन हो, पर इस बात को समझ लेना सेहत की पहली सीढी है । दूसरी सीढी है, समझने के साथ-साथ कोशिश भी करना। जब किसी के जीवन में यह बुनियादी परिवर्तन आता है, तो उसके लिए स्वाभाविक हो जाता है कि वह उसके साथ-साथ कुदरत के उन तमाम कानूनों का पालन भी करे, जो आज तक मनुष्य ने ढूढ निकाले है। जब तक उनकी उपेक्षा की जाय, तब तक कोई यह नहीं कह सकता कि उसका हृदय पवित्र हैं। यह कहना गलत न होगा कि अगर किसी का हृदय पवित्र है, तो उसकी सेहत रामनाम न लेते हुए भी उतनी ही अच्छी रह सकती है। बात सिर्फ यह है कि सिवा रामनाम के पवित्रता पाने का और कोई तरीका मुझे मालूम नहीं । दुनिया में हर जगह पुराने ऋषि भी इसी रास्ते पर चले है। और वे तो भगवान के बन्दे थे, कोई वहमी या ढोगी आदमी नहीं ।

     अगर इसी का नाम ‘ ऋिश्चियन सायन्स' है, तो मुझे कुछ कहना नहीं है। मै यह थोडी ही कहता हू कि रामनाम मेरी ही शोध है। जहा तक मै जानता हू, रामनाम तो ईसाई धर्म से भी पुराना है।
     एक भाई पूछते है कि क्या रामनाम मे ऑपरेशन की इजाज़त नहीं ? क्यो नहीं ? एक टाग अगर दुर्घटना में कट गई है, तो रामनाम उसे थोडे ही वापस ला सकता है। लेकिन बहुत सी हालतो मे ऑपरेशन जरूरी नहीं होता । मगर जहा जरूरी हो वहा करवा लेना चाहिये । सिर्फ इतनी बात है कि अगर भगवान के किसी बन्दे का हाथ-पाव जाता रहे, तो वह इसकी चिन्ता नहीं करेगा । रामनाम कोई अटकलपच्चू तजवीज नहीं है, और न कोई कामचलाऊ चीज़ ही ।

हरिजनसेवक, ९-६-१९४६