पृष्ठ:Ramanama.pdf/६७

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प्रार्थना-प्रवचनो में से ५९ शरीर तो आखिर एक दिन मिटने ही वाला है। उसका स्वभाव ही है कि वह हमेशाके लिए रह ही नही सकता । और तिस पर भी लोग अपने अन्दर रहनेवाली अमर आत्माको भुलाकर उसीका ज्यादा प्यार-दुलार करते है। रामनाममे श्रद्धा रखनेवाला आदमी अपने शरीरको ऍसे झूठे लाड नही लडायेगा, बल्कि उसे इश्वरकी सेवा करनेका एक जरिया-भर समझेगा। उसको इस तरहका माकूल जरिया बनानेके लिए रामनामसे बढकर दूसरी कोई चीज़् नही। “ रामनामको हृदयमे अकित करनेके लिए अनन्त धीरजकी जरूरत है। इसमे युग-के-युग लग सकते है, लेकिन यह कोशिश करने जैसी है। इसमे कामयाबी भी भगवानकी कृपासे ही मिल सकती है। “ जब तक आदमी अपने अन्दर और बाहर सचाई, ईमानदारी और पवित्रताके गुणोको नही बढाता, तब तक उसके दिलसे रामनाम नही निकल सकता। हम लोग रोज शामकी प्रार्थनामे स्थितप्रज्ञका वर्णन करनेवाले श्लोक पढते है। हममे से हरएक आदमी स्थितप्रज्ञ बन सकता है, बशर्ते कि वह अपनी इन्द्रियोको अपने काबूमे रखे और जीवनको सेवामय बनानेके लिए ही खाये, पीये और मौज-शौक या हसी-विनोद करे । मसलन्, अगर अपने विचारो पर आपका कोई काबू नही है और अगर आप एक तग अंधेरी कोठरीमे उसकी तमाम खिडकिया और दरवाजे बन्द करके सोनेमे कोई हर्ज नहीं समझते और गन्दी हवा लेते है या गन्दा पानी पीते है, तो मै कहूगा कि आपका रामनाम लेना बेकार है । “ लेकिन इसका यह मतलब नही कि चूकि आप जितने चाहिये उतने पवित्र नही है, इसलिये आपको रामनाम लेना छोड देना चाहिये। क्योकि पवित्र बननेके लिए भी रामनाम लेना लाभकारी है । जो आदमी दिलसे रामनाम लेता है, वह आसानीसे अपने-आप पर काबू रख सकता है और अनुशासनमे रह सकता है। उसके लिए तन्दुरुस्ती और सफाओके नियमोका पालन करना सहल हो जायगा। उसकी जिन्दगी सहज भाव से बीत सकेगी -उसमे कोई विषमता न होगी । वह किसीको सताना या दुःख पहुचाना पसन्द नही करेगा । दूसरोके दूःखोको मिटानेके लिए, उन्हें राहत पहुचानेके लिए, खुद तकलीफ उठा लेना उसकी आदत मे आ जायगा और उसको हमेशाके लिए एक अमिट सुख का लाभ मिलेगा-उसका मन एक शाश्वत और अमर सुखसे भर जायगा ।