पृष्ठ:Ramanama.pdf/७१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


प्रार्थना-प्रवचनोमें से ६३ ईश्वरके नामका अमृत प्रार्थनामे गाये हुए मीराबाईके भजनकी व्याख्या करते हुए गाधीजीने कहा इस भजनमे भक्त आत्मासे जी भरकर ईश्वर-नामका अमृत पीनेको कहता है। मामूली खान-पानसे आदमीका दिल ऊब जाता है और जरूरतसे ज्यादा खाने-पीनेसे बीमारी होती है। लेकिन ईश्वर-नामके अमृतकी ऐसी कोई सीमा नही है। आदमी जितना ज्यादा उसे पीता है, उतनी ही उसके लिए उसकी प्यास बढती है---लेकिन वह हृदयमे गहरा पैठ जाना चाहिये। जब ऐसा होता है तब हमारा सारा भ्रम और आसक्ति, सारी वासना और द्वेष दूर हो जाते हैं । शर्त यही है कि हम इस कोशिशमे लगे रहे और धीरज रखे । ऐसे प्रयत्नका अनिवार्य नतीजा सफलता है। - नई दिल्ली, १८-६-४६ श्रद्धाका चमत्कार आजकी प्रार्थना-सभामे गाधीजीने कहा “प्रार्थनामे श्रद्धा रखनेवालेके लिए निराशा नामकी कोई चीज नही होनी चाहिए, क्योकि वह जानता है कि समय उस सर्वशक्तिमान भगवानके हाथमें है। वही समय पर सब कुछ करता है। इसलिए भक्त हमेशा श्रद्धा और धीरजके साथ किसी भी कामके होनेका रास्ता देखता है।” गजेन्द्र-मोक्षकी कथा पर टीका करते हुए उन्होने कहा “इस कथाका निचोड यह है कि परीक्षाके समय ईश्वर हमेशा अपने भक्तकी मदद करता है। शर्त यही है कि उस पर मनुष्यकी जीती-जागती श्रद्धा हो और उसीका मनुष्य आसरा ले । श्रद्धाकी कसौटी यह है कि अपना फर्ज अदा करनेके बाद उसका जो कुछ भी भला या बुरा नतीजा हो उसे मनुष्य मान ले । सुख आये या दुख, उसके लिए दोनो बराबर होने चाहिए। जनक राजाके बारे मे कहा जाता है कि एक बार उन्हे किसी ने आकर कहा 'महाराज! आपकी राजधानी मिथिला जल रही है।’ उन्होंने जवाब दिया ‘मिथिलाया प्रदग्धाया न मे दह्यति कश्चन'-- मिथिलाको आग लगी है तो मुझे उससे क्या? उनके इस धीरज और शान्तिका रहस्य यह था कि वे हमेशा जाग्रत रहते थे, हमेशा अपना फर्ज अदा करते थे । इसलिए बाकी सब कुछ वे ईश्वर पर छोड सकते थे ।