पृष्ठ:Ramanama.pdf/७७

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परिशिष्ट

                                     सच्चा डॉक्टर राम ही है
             
           नोआखाली में आमकी नाम का एक गाँव है। वहाँ बापूजी के लिये बकरी का दूध कहीं न मिल सका। सब तरफ तलाश करते-करते जब मैं थक गयी, तब आखिर मैंने बापू को यह बात बतायी। बापूजी कहने लगे "तो उसमें क्या हुआ? नारियल का दूध बकरी के दूध की जगह अच्छी तरह काम दे सकता है। और बकरी के घी के बजाय हम नारियल का ताज़ा तेल निकाल कर खाएंगे।"
           इसके बाद नारियल का दूध और तेल निकालने का तरीका बापू ने मुझे बताया। मैंने निकाल कर उन्हें दिया। बापूजी बकरी का दूध हमेशा आठ औंस लेते थे, उसी तरह नारियल का दूध भी आठ औंस लिया। लेकिन हजम करने में बहुत भारी पड़ा और उससे उन्हें दस्त होने लगे। इससे शाम तक बापू को इतनी कमज़ोरी आ गयी कि बाहर से झोंपड़ी में आते -आते उन्हें चक्कर आ गये।
            
          जब-जब बापू को चक्कर आने वाले होते, तब-तब उनके चिह्न पहले ही दिखाई देने लगते थे।उन्हें बहुत ज्यादा जभाईयाँ आतीं, पसीना आता, और कभी-कभी वे आखें भी फेर लेते थे। इस तरह उनके जभाईयाँ लेने से चक्कर आने की सूचना तो मुझे पहले ही मिल चुकी थी। मगर मैं सोच रही थी कि अब बिछौना चार ही फुट तो रहा, वहाँ तक तो बापूजी पहुँच ही जाएंगे। लेकिन मेरा अन्दाज़ गलत निकला। और मेरे सहारे चलते-चलते ही बापूजी लड़खड़ाने लगे। मैंने सावधानी से उनका सिर संभाल रखा और निर्मल बाबू को जोर से पुकारा। वे आये और हम दोनों ने मिलकर उन्हें बिछौने पर सुला दिया। फ़िर मैंने सोचा - 'कहीं बापू ज्यादा बीमार हो गये, तो लोग मुझे मूर्ख कहेंगे। पास के देहात में ही सुशीलाबहन हैं। उन्हें न बुलवा लूँ?' मैंने चिठ्ठी लिखी और भिजवाने के लिए निर्मल बापू के हाथ में दी ही थी कि इतने में बापू को होश आया और मुझे पुकारा "मनुडी!"
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