पृष्ठ:Ramanama.pdf/७९

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७२ रामनाम

चाहिये और फल ईश्वर के हाथ में छोड़ देना चाहिये। इसलिए तुम्हें, मुझे और सबको कोशिश तो करनी ही चाहिये। अब तुम समझी न कि मेरी, तुम्हारी या किसी की बीमारी के विषय में मेरी क्या धारणा है?”

       उसी दिन एक बीमार बहन को पत्र लिखते हुए भी बापू ने यही बात लिखी - “संसार में अगर कोई अचूक दवायी हो तो वह रामनाम है। इस नाम के रटनेवालों को इसका अधिकार प्राप्त करने के लिए जिन-जिन नियमों का पालन करना चाहिये, उन सबका वे पालन करें। मगर यह रामबाण इलाज करने की हम सबमें योग्यता कहां है?”
  (मेरी रोज की नोआखाली की डायरी में से)
       ऊपर की घटना ३० जनवरी, १९४७ के दिन घटी थी। बापू की मृत्यु से ठीक एक साल पहले।
       रामनाम पर की उनकी यह श्रद्धा आखिरी क्षण तक अचल रही। १९४७ की ३०वीं जनवरी को यह मधुर घटना घटी; और १९४८ की ३०वीं जनवरी को बापू ने मुझसे कहा कि ‘आखिरी दम तक हमें रामनाम रटते रहना चाहिए।' इस तरह आखिरी वक्त भी दो बार बापू के मुंह से ‘रा . . . म ! रा . . . म !' सुनना मेरे ही भाग्य में बदा होगा, इसकी मुझे क्या कल्पना थी? ईश्वर की गति कैसी गहन है!
      (‘बापू - मेरी मां' से)