पृष्ठ:Sakuntala in Hindi.pdf/१००

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
81
[ACT VI.
SAKUNTALA.

SAKUNTALA. [ACT VI. दुष्य' । कहो पर्वतायन क्या है ॥ चोव० । महाराज बड़ा उत्पात है ॥ दुष्य' । तू कांपता क्यों है । बुढ़ापे में मनुष्य की क्या गति हो जाती है। डर से बूढ़े मनुष का शरीर ऐस थरथराता है जैसे पवन लगने से पीपल का वृक्ष ॥ . चोब । अपने सखा को छुड़ाओ। दुष्य । छड़ाओ । काहे में से॥ चोव। आपत्ति में से॥ दुष्य । क्या कहते हो। चोब । वह भीति जिम से आकाश के चारों कोने दिखाई देते हैं और बादलों के मिले रहने से मेघच्छन्द कहलाती है . . . .॥ दुष्य। सो क्या ॥ चोब । उस भीति की मुडेल से जहां नोलग्रीव कपोत का भी पहुंचना कठिन है एक पिशाच ऐसा आया कि किप्ती को दृष्टि न पड़ा और आप के सखा को ले जाकर उसी भीति पर रख दिया ॥ दुष्य । (तुरंत उठकर) हय मेरे रनवास में भी पिशाच रहते हैं । सत्य है राजा को अनेक विघ्न होते हैं । राजा उन उत्पातों को भी नहीं जानता है जो उसी के अधर्म से प्रतिदिन और प्रति छिन राजभवन में हुआ करते हैं । फिर वह क्योंकर जान सकता है कि मेरी प्रजा सुमार्ग में चलती है या कुमार्ग में । और जब राजा के कर्म आप ही निरङ्कुश हों तो वह प्रजा के कर्मों को किस भांति सुधार सकता है । (नेपथ्य में) चलियो चलियो । दुय । (मुनता और दौड़ता हुआ) डरो मत मित्र । कुछ भय नहीं है। निपथ्य में) भय क्यों नहीं है । भूत तो मेरा कण्ठ पकड़े। कलेजा ऐंठे डालता है।