पृष्ठ:Sakuntala in Hindi.pdf/११०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


H [ACT VIL. SA KUNTALA. __ दू तप० । जिस राजा ने अपनी विवाहिता स्त्री को विना अपराध छोड़ दिया है उस का नाम मैं न लूंगी ॥ दुष्य० । (आप ही आप) यह कथा तो मुझी पर लगती है। भला अब इस बालक की मा का नाम पूछू । (सोचकर परंतु सत्पुरुषों की रीति नहीं है कि पराई स्त्री का वृत्तान्त पूछे ॥ (पहली तपस्विनी खिलौना लेकर आई) । प० तप० । हे सर्वदमन यह कैसा शकुन्तलावण्य" है ॥ बालक ! (पड़े चाय से देखकर कहां है शकुन्तला मेरी माता ॥ दोनों तप० । (हंसती हुई) यहां तेरी माता नहीं है । हम ने दुअर्थी बात कही थी। अर्थात सुन्दर पक्षी दिखाया था ॥ दुष्य । (आप ही आप) इस की मा मेरी ही प्यारी शकुन्तला है या इस नाम की कोई दूसरी स्त्री है। यह वृत्तान्त मुझे ऐसा व्याकुल करता है जैसे मृगतृष्णा प्यासे हरिण को निरास करती है । ___ बालक । जो यह मोर चले फिरेगा और उड़ेगा तौ मानूंगा। नहीं तो नहीं ॥ प० तप० । (यराकर) आहा बालक की बांह से रक्षाबन्धन कहां गया॥ (खिलौना ले लिया) दुष्य । घबराओ मत । जब यह नाहर से खेल रहा था तब इस के हाथ से गंडा गिर गया था। सो वह पड़ा है। मैं उठाकर तुम्हें दिये देता हूं ॥ (उठाना चाहा) दोनों तप । हाय हाय इस गंडे को छना मत ॥ प० तप० । हाय इस ने तो उठा ही लिया ॥ (दोनों पापस में अचंभे से देखने लगी) __दुप्प० । गंडा यह लो। परंतु यह कहो कि तुम ने मुझे इस के छूने से रोका क्यों था ॥ टू' तप० । इस लिये रोका था कि इस यन्त्र में बड़ी शक्ति है । जिस