पृष्ठ:Sakuntala in Hindi.pdf/११३

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___7 ACT VII] SAKUNTAL. शकु० । उठो प्राणपति उठो । मेरे सुख में बहुत दिन विघ्न रहा परंतु तुम्हारा हित अब तक मुझ में बना है । यह बड़े सुख का मूल है । (राजा उटा) मुझ दुखिया को सुध कैसे आप को आई सो कहो ॥ टूष्य । जब विरहबिथा का कांटा मेरे कलेजे से निकल जायगा तब सब वृत्तान्त कहंगा । अव तू मुझे अपने सुन्दर पलकों से आंसू पोंछ देने दे जिस से मेरा यह पछतावा दूर हो कि उस दिन में ने भ्रम में आकर तेरे आंस देख अनदेखे किये थे ॥ (प्रांमू पोंछने को हाथ बढ़ाया शकुछ । (सपने शाम पोइकर और राजा को उंगलों में अंगूठी देखकर) अहा यह वही बिसासिन" अंगूठी है ॥ दुष्य० । इसी के मिलते मुझे तेरी सुध आई ॥ शकु । तो यह बड़ेगुणभरी" है कि इस से फिर आप को गई प्रतीति मुझ पर आई ॥ दुष्प० । हे प्यारी अब तू इसे पहन जैसे ऋतु के चिह्न के लिये पृथी फूल धारण करती है ॥ शकु । मुझे इस का विश्वास नहीं रहा है। आप ही पहनो॥ (माताल माया) मातलि । महाराज धन्य है यह दिन कि आप ने फिर अपनी धर्मपत्नी पाई और पुत्र का मुख देखा ॥ दुष्य० । मित्रों ही की दया से मेरी अभिलाषा पूरी हुई है। परंतु यह तो कहो कि इस वृत्तान्त को इन्द्र जानता था या नहीं । भात । (हंसकर) देवता क्या नहीं जानते हैं । अब आओ । महात्मा कश्यप आप को दर्शन देंगे ॥ दुष्य० । प्यारी चलो और सर्वदमन की भी उंगली धामे चलो। महात्मा का दर्शन कर अ वें ॥ शकु । आप के संग बड़ों के संमुख जाने में मुझे लज्जा आती है ।