पृष्ठ:Sakuntala in Hindi.pdf/१७

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शकुन्तला॥

अङ्क १

स्थान वन ॥

(दुष्यन्त रथ पर चढ़ा धनुष बाण लिये' हरिण को खेदता सारथी सहित आया?)

सारथी। (पहले हरिण की ओर फिर राना की ओर देखकर) महाराज जब में इस करसालय पर दृष्टि करता हूं और फिर आप को धनुष चढ़ाये देखता ई तो साक्षात ऐसा ध्यान बंधता है मानों पिनाक संधान किये शिव जी शूकर के पीछे जाते ह ॥

दुष्यन्त। इस मृग ने हम को बहुत थकाया है। देखो कभी सिर झुकाये रथ को फिर फिर देखता चैीकड़ी भरता है कभी तीर लगने के डर से सिमटता है। अब देखो हांफता हुआ अधखुले मुख से घास खाने को टिटका हैं ? फिर देखो कैसी छलांग भरी है कि धरती से ऊपर ही दिखाई देता है। देखी अब इतने वेग से जाता हैं कि दिखाई भी सहज नहीं पड़ता" ॥ सार० । महाराज अब तक धरती ऊंची नीची थी"। इस से में ने घोड़े रोक रोककर" चलाये थे और इसी से वह कुरङ्ग दूर निकल गया है। परंतु अब भूमि एक सी आई । दो ही । सरपट में ले लेंगे॥

दुष्य०। अब घोड़ेां की रास छोड़ो ॥

सार० । जो आज्ञा" (पहले रथ को भरद्दौड़ चलाया फिर मंदा किपा) देखिये रासB