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ACT ॥.]
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SAKUNTALA.

माढ० । मैं पूछता हूं कि यह बात तुम को कब योग्य है कि ऐसे राजकाजों को भल और ऐसे रनवास को त्याग यहां वन में बसो और वनवासियों के से काम करो"। नित्य कुत्तों और मृगों के पीछे दौड़ते दौड़ते मेरा तौ अङ्ग शिथिल हो गया है । अब कृपा करके एक दिन विश्राम लेने दो ॥


दुष्य० । (आप ही आप) इधर यह भी कहता है उधर मेरा चित्त भी ऋषिकुमारी की सुध में आखेट से निरुत्साह हो रहा है । अब मैं इस धनुष को प्यारी की सहवासी हरिणियों पर जिन की आंखों ने उसे भोली चितवन सिखायी है कैसे चलाऊंगा।


माढ० । (राजा के मुख की ओर देखकर) तुम्हारे मन में जाने क्या सोच है। मेरी बात तो ऐसी हो गई जैसे वन में रोना ॥


दुष्य० । (हंसकर) मेरे मन में यही है कि तुझ सखा की बात मानूं ॥


माढ० । (प्रसन्न होकर) बड़ी आर्बल हो ॥ (उठ खड़ा हुषा दुर्पलता का मिस करता हुआ)


दुष्य० । मित्र ठहरो । हम को कुछ और कहना है ॥


माढ० । कहिये ॥


दुष्य० । जब तुम विश्वाम ले चुको" तब हम एक ऐसे काम में तुम से सहायता लेंगे जिस में कुछ दौड़ना भागना न पड़ेगा॥


माढ० । अहह क्या खांड के लड्डू खिलाओगे तौ। तो अभी अच्छा अवसर है ॥


दुष्य० । अच्छा । अभी कहता हूं किसी द्वारपाल को बुलाओ ।।


(द्वारपाल आया)

द्वारपाल । (नमस्कार कर के स्वामी की क्या आज्ञा है॥


दुष्य० । हे रैवतक तुम सेनापति को बुलाओ।


द्वार० । बहुत अच्छा । (घाहर जाकर सेनःपति को बुला लाया) आओ तुम्हारी ही राह देखते महागज बैठे हैं ॥