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ACT॥.]
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SAKUNTALA.

सेन । जो इच्छा महाराज की" ॥


दुष्य० । आगे जो कमनेत बढ़ गये हैं उन को लौटा लो और सेना के लोगों को बरज दो कि इस तपोवन में कुछ विघ्न न डालें । उन को समझा दो कि यद्यपि तपस्वी लोगों में क्षमा बहुत होती है परंतु जब उन को क्रोध आता है तो उन के भीतर दाहक शक्ति भड़क उठती है । जैसे सूर्यकान्ति " मणि का स्वभाव है कि वैसे तो छूने से" ठंढी लगती है परंतु सूर्य के संमुख होते ही अग के समान हो जाती है "॥


सेन० । जो आज्ञा महाराज की ॥


माढ० । चल जा।ऐसे ही तेरा मुख बिगड़ता रहे ॥(सेनापति गया)


दुष्य' । (सेवकों की ओर देखकर) तुम भी अपना भेष उतार डालो और रैवतक तुम द्वार पर रहो । जब हम पुकारें तब उत्तर दो ।।


द्वार० । जो आज्ञा ॥ (बाहर गया)


माढ० । इस स्थान को मला आप ने निर्मल कर दिया। अब यहां कोई मक्खी भी नहीं रही । सुन्दर वृक्षों की छाया में इस आसन पर बैठिये । मैं भी सुख से विश्राम लूंगा और वह बात सुनूंगा जिस में आप ने कहा था कि दौड़ धूप न होगी ॥


दुष्य० । पहले तुम ही बैठो॥


माढ० । आइये ॥ (दोनों एक वृष्टा के नीचे बैठे)


दुष्य० । हे माढव्य इस संसार में जो पदार्थ देखने योग्य है उस के दर्शन का सुख तेरे नेत्रों को प्राप्त नहीं हुआ ॥


माढ० । सत्य है काहे से कि इन नेत्रों को नित्य महाराज का दर्शन मिलता है ॥


दुष्य० । अपनी बड़ाई तौ सभी को भाती है। परंतु मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि तेरे नेवों ने कभी शकुन्तला वो नहीं देखा है जो इस आश्रम की शोभा है ॥


माढ० । (आप ही आप) ऐसी लगन वो बढ़ने देना अच्छा नहीं है।