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Act III.]
37
SAKUNTALÀ

दुष्य० । (आप ही आप) अब मुझे विश्वास हुआ¹²0 । क्योंकि आर्य पुत्र शब्द केवल पति के लिये बोला जाता है । (प्रगट) प्यारी यह कङ्कण तुम्हारी बांह में ठीक न आया । लाओ इसे फिरकर बनावें॥


शकु० । (हंसकर) जैसे तुम्हारी इच्छा हो ॥


दुष्य० । (कुछ विलस करके) यह अर्द्धचन्द्र है कि शोभा पाने के लिये आकाश को छोड़ तेरी बांह पर कङ्कण बनने आया है ।


शकु० । कुछ मुझे तो चन्द्रमा सूझता नहीं है । मेरे कानों पर कमल के फूल हैं इन से पराग उड़कर आंखों में पड़ा है। इस से दृष्टि इस समय मंदी हो रही है।


दुष्यः० । (हंसकर) कहे तो मुख से फूंककर आंखों को निर्मल कर दूं ॥


शकु०‌ । यह तो बड़ी कृपा हो । परंतु मुझे तुम्हारा विश्वास नहीं है।


दुष्य० । कभी नया सेवक स्वामी की आज्ञा से कुछ अधिक करते भी सुना है ॥


शकु० । तुम्हारी यही लुरखुरी की बातें तो विश्वास नहीं होने देती। (धीरे से फूंक मारी) बस करो। अब मेरी दृष्टि ज्यों की त्यों हो गई । अब में लजाती हूं कि मुझ में कोई गुण ऐसा नहीं है जिस से आप के इस अनुग्रह का पलटा दे सकू


दुष्य० । इस से बड़ा और क्या पलटा होगा कि तू ने अपने होंठों का सौरभ मुझे लेने दिया । क्योंकि भौंरा कमल की वासना ही से संतुष्ट हो जाता है।
(नेपथ्य में) हे चकवी अब चकवे से न्यारी हो । रात आई ॥


शकु० । (कान लगाकर और सटपटाकर) हे महाराजकुमार निश्चय मेरे शरीर का वृत्तान्त पूछने को कन्व की छोटी बहन गौतमी आती है । तुम वृक्ष की आड़ में हो जाओ


दुष्य० अच्छा । यही करूंगा ॥ (चला गया)


(हाथ में कमण्डल लिये गौतमी आई)