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ACT IV.]
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SAKUNATALA.

(शकुन्तला और गौतमी और तपस्वियों की स्त्रियां साई)

१ तपस्विनी । हे राजवधू तू पति की प्यारी हो ॥

२ तपस्विनी । तू सूरवीर पुत्र की माता हो ॥ (माशोयाद देकर तपखिनी गई)

दो० सखी । small>(शकुन्तला के निकट जाकर) कहो सखी स्नान अच्छे हुए ॥

शकु० । (अादर मे) सखियो भली आई। यहां बैठो। कुछ बातें करें ।(दोनों बैठ गई)

अन० । तुम नेक ठहरो । तौ मैं कुछ मङ्गल नेग कर दूं॥

शकु० । तुम करोगी सो अच्छा ही करोगी। परंतु फिर तुम से मिलने का अवसर कठिन हो जायगा ॥ (यह कहकर सामू डाल दिये)

दो० सखी । सखी ऐसे मङ्गल समय जब कि तू सुख भोगने जाती है रोना उचित नहीं है ॥ (यह कहकर दोनों ने आंसू डाल दिये और वस्त्र पह राने लगी)

प्रि० । सखी तेरे इस सुन्दर अङ्ग को तौ अच्छे वस्त्राभरण चाहिये थे। परंतु अब ये ही साधारण फूल पते आश्रम में मिल सके हम पहराती हैं।


(कन्व का घेला अच्छे अच्छे वस्त्राभूपण लेकर पाया)


चेला । रानी को ये वस्त्राभूषण पहराओ ॥ (देखकर सब स्त्री चकित हो गई)

गौतमी । हे पुष हारीत ये वस्त्राभूषण कहां से आए ॥

चेला । पिता कन्व के तपप्रभाव से ॥

गौ० । क्या यह मन में विचारते ही प्राप्त हो गये ॥

चेला । नहीं। महात्मा काश्यप की आज्ञा हुई कि शकुन्तला के निमित्त वृक्षों से फूल ले आओ । आयसु होते ही तुरंत किसी वनदेवी ने कोमल हाथ उठाकर चन्द्रमा के तुल्य श्वेत साड़ी दी । किसी ने महावर के लिये लाक्षारस दिया । कोई भूषण बनाने लगी