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ACT IV.]
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SAKUNTALA.


हिंगोट का तेल लगाती थी और जिस को तें ने समा के चांवल खिला खिलाकर इतना बड़ा किया है। अब यह अपनी पालनेवाली के चरण क्योंकर छोड़े॥

शकु० । अरे छौना तू मेरे लिये क्यों रोता है । तेरी मा तौ तुझे जनते ही छोड़ मरी थी । मैं ने पालकर तुझे इतना बड़ा किया है। तैसे ही मेरे पीछे" पिता कन्व तेरा पालन करेंगे । अव तू लौट जा॥ (आंसू डालती चली)

कन्व । बेटी यह समय रोने का नहीं है। हम सब फिर मिलेंगे। आंसुओं से तेरी दृष्टि रुक रही है। इस से ऐसा न हो कि ऊंचे नीचे में पांव पड़े । अब तू अपने धीरज से आंसुओं को रोक ॥

सारथी । हे महात्मा सुनते हैं कि प्यासे मनुष्यों को पहुंचाने वहीं तक जाना चाहिये जहां तक जलाशय न मिले । अब यह सरोवर का तट आ गया । आप हम को आज्ञा देकर आश्रम को सिधारो॥

कन्व । तौ आओ छिन मात्र इस वट की छाया में ठहर लें । (करनेछाया में गये)राजाष्यन्त को क्या संदेसा भेजना योग्य है ॥ (विचार करने लगा)

अन० । (शकुन्तला से हौले हौले)हे सखी आज इस आश्रम में सब का चित्त तुझी में लगा है और सब तेरे बिछोह में उदास हैं । देख चकवी कमल के पनों में बैठी बहुतेरा बोलती है परंतु चकवा उत्तर नहीं देता। चोंच से चुगा" छोड़ तेरी ही ओर निहार रहा है ॥

कन्व । पुत्र शाड्गंरव जब तू राजा के संमुख पहुंचे तब शकुन्तला को आगे करके मेरी ओर से यह कहियो कि हम तपस्वियोंं को केवल तप के धनी जानो और अपने श्रेष्ठ कूल को बिचारकर" इस लड़की पर भी सब रानियों की भांति वहीं स्नेह रक्खो जो तुम्हारे हृदय में आप से आप इस की ओर उत्पन्न हुआ है। इस

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