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ACT VI.]
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SAKUNTALA.

शकु० । (कन्व से भेटकर)हाययमैं पिता की गोद से न्यारी होकर मलय-गिरि से उखाड़े चन्दन के पौधे की भांति विहनी भूमि में कैसे जीऊंगी ॥

कन्व । पुत्री ऐसी विकल मत हो । जब तू घर की धनी होगी और राजापति मिलेगा तब वैभव के कामों में यद्यपि कभी कभी व्याकुल हो जायगी परंतु इस दुख का कुछ बहुत स्मरण न रहेगा। और फिर जब तेरे तेजस्वी पुत्र का जन्म होगा तब इस बिछोह को भूल जायगी । (शकुन्तला ऋषि के पैरों में गिर पड़ी) मेरे आशीर्वाद तेरी मनो-कामना पूरी होगी॥

शकु० । (दोनों सखियों के पास जाकर) आओ सखियो। दोनों एक ही संग भुजा पसारके भेट लो॥

अन० । (दोनों मिली) हे सखी कदाचित राजा तुरंत तुझ को न पहचान ले" तो यह मुदरी जिस पर उस का नाम खुदा है दिखा दीजियो॥

शकु० । (घबराकर)सखी तेरे इस वचन ने तो मेरा हृदय कंपा दिया ।

प्रि० । प्यारी डरे मत । स्नेह में झूठी शङ्का बहुधा उठती हैं ।

सारथी । अब दिन बहुत चढ़ गया है। चलो बिदा हो ॥

शकु० । (फिर साश्रम की शोर देखकर)हे पिता इस आश्रम को कब फिर देखूगी॥

कन्व । बेटी जब कुछ काल पति के साथ तुझे बीत लेगा और तेरे महाबली पुत्र हो लेगा तब उस पुत्र को राज्य सौंपकर अपने पति सहित इस आश्रम में तू फिर आवेगी ॥

गौ० । चलने का समय बीता जाता है । अब पिता को लौट जाने दे । मुनि जी आप जाओ।

कन्व । हे बेटी मेरे नित्यकर्म में विघ्न मत डाले । (स्वास लेकर) मेरा शोक घटेगा क्योंकि तेरे सुकुमार हाथों के बोये धान कुटी के सामने नित्य दृष्टि के सोही रहेंगे। अब सिधारो। मार्ग मङ्गलकारी हो ॥ सामने और दोनों मित्रों सहित शकुन्तला गई)

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