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ACT V.]
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SAKUNATALA.


मुझे उचित नहीं है कि इस समय कन्व के चेलों के आने का संदेसा कहं । नहीं तो राजा विश्राम को जाने से रुक जायगे । परंतु जिन के मिर4 पृथी का भार है उन्हें विश्राम कहां होता है। सूर्य के रथ में घोड़े सदैव5 जुते ही रहते हैं। पवन दिन रात चला ही करता है । शेष-नाग6 सदा पृथी को सिर पर धरे ही रहता है। ऐसे ही जिस ने प्रजा की कमाई से छटा भाग7 लिया उस को किसी समय विश्राम नहीं है ॥(इधर उधर डोलने लगा)

(दुष्यन्त और माटव्य कुलमेवकों समेत सार)

दुष्यन्त । (अकुलाना सा) याचक तौ अपना अपना वांछित पाकर प्रसन्नता से चले जाते हैं । परंतु जो राजा अपने अन्तःकरण से9 प्रजा का निधार करता है नित्य चिन्ता ही में रहता है। पहले तो राज्य बढ़ाने की कामना चित को खेदित करती है । फिर जो देश जीतकर बस किये उन की प्रजा के प्रतिपालन का नियम दिन रात मन को विकल रखता है जैसे बड़ा छत्र यद्यपि घाम से रक्षा करता है परंतु बोझ भी देता है।

(दो ढाड़ी9 गाते हुए पाए) 10


प० ढाड़ी।

कड़खा।


निजकारणदुख ना सहो सहो पराए कान ।
राजकुल न व्यवहार यह मो पालहु महाराज ॥
अपने सिर पर लेत हैं वर्षा शोत रू घाम ।
जिमि तरवर हित पथिक के निज तर दै विश्राम॥

टू ढाड़ी।

छप्पया


दुष्ट जनन वशकरन लेत जम दण्ड प्रचण्ड हि ।
देत दण्ड उन नरन चलन मयाद जो एंड हि ॥
करत प्रजाप्रतिपाल कलह के मूल विनाश हि ।
जिहि निमिन नपजन्म धर्म सब करत प्रकाश हि ॥
महाराज दुष्मन्त जू चिरजीवो नित नवलक्य ।
मेटि विन उत्पात सब प्रन हि करि राखो अभय ।