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[ACT V.
SAKUNTALA


(नौकरों के कंधों पर महारा लेकर दुप्पन्न यज्ञस्थान की देहली पर गया)

दुष्य० । कन्व मुनि ने क्या संदेसा भेजा होगा । कहीं तपस्वियों के तप में किसी ने विघ्न तो नहीं डाला । अथवा तपोवन के जीवों को किमी ने सताया तौ न हो। अथवा मेरे पापों से तपस्वियों की बोई लतावेलों का फूलना तो नहीं मिट गया। ये सब असमञ्जस मेरे चित्त को व्याकुल करते हैं ॥

कञ्चुकी । जिस बात की चिन्ता महाराज को है सो कभी न हुई होगी क्योंकि तपोवन के विघ्न तो केवल आप के धनुष की टंकार ही से मिट जाते हैं। मेरे जाने ये तपस्वी महाराज के सुकर्मों से प्रसन्न होकर धन्यवाद देने आए हैं।

(शारहत और शाईरव और गौतमी शकुन्तला का हाथ गहे हुए पाए। और उन के आगे आगे बूढा द्वारपाल और पुरोहित भी पाए)

द्वारपाल । इधर आओ महात्माओ । इस मार्ग आओ ॥ शाङ्गरव । हे मित्र शारदत देखो। जिस राजा के आधीन संसार के सर्वमुख हैं और जो सव मनुष्यों का आदर संमान करता है सो वह विराजमान है । यहां कोई कैसा ही आवे निरादर किसी का नहीं होता है । परंतु मेरा चिन्न सदा सांसारिक बातों से विरक्त रहा है। इस लिये आज बहुत से मनुष्यों में आने से मन घबराता है ।

शारदत । सत्य है। जब से नगर में धसे हैं तब से मेरी भी यही दशा है। परंतु मैं ने तो अपना मन ऐसे समझा लिया है जैसे कोई निर्मल जल से न्हाया किसी तेल मिट्टी लपेटे हुए के साथ परबस पड़ जाय अथवा शुद्ध मनुष्य को अशुद्ध के साथ और जागते हुए को सोते के साथ और स्वतन्त्र को बंधुए के साथ रहना हो और वह अपने मन को धीरज दे॥

पुरोहित । इसी से तो आप सरीके सज्जनों की बड़ाई है ॥ शकुन्तला। (बुरा सगुन देखकर हे माता मेरी दाहिनी आंख क्यों फरकती है।।