पृष्ठ:Sakuntala in Hindi.pdf/७९

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63 AcTV.] SAKUNTAL. प्रतीति करता है। यहां तो वे ही सचे हैं जो दूसरे को दोष लगाना दुथ । तुम बड़े सत्यवादी हो । ठीक कहते हो । मैं ऐसा ही हूं। परंतु यह कहो इस स्त्री को दोष लगाने से मुझे क्या मिलेगा ॥ शारिव । भारी विति ॥ दुष्य० । नहीं। पुरुवंशियों के भाग्य में विपत्ति कभी नहीं लिखी ॥ शारइत । हे शारव इस बाद से क्या अर्थ निकलेगा। हम तौ गुरु का संदेसा लाए थे सो भुगता चुके । अब चलो। और हे राजा यह शकुन्तला तेरी विवाहिता स्त्री है चाहे तू इसे रख चाहे छोड़ । स्त्री के ऊपर पति को सब अधिकार होता है। आओ गौतमी । चलो ॥ (दोनों मिन" और गोतमी घले) शकु० । हाय यह तो छलिया निकला। अब क्या तुम भी मुझे छोड़ जाओगे ॥ (उन के पीछे चल खड़ी हुई) गौतमी । (पोछे मिरकर) बेटा शाईरव शकुन्तला तो विलाप करती यह पीछे पीछे आती है । दुखिया को निर्मोही पति ने छोड़ दिया । अब यह क्या करें। शार्ङ्गरव । (क्रोध करके शकुन्तला से) हे अभागी तू पति के औगुण देखकर क्या स्वतन्त्र हुआ चाहती है ॥ (शकुनला ठहर गई और कांपने लगी) शारद्दत । हे भाग्यमान सुन ले। जो तू ऐसी ही है जैसा तेरा पति कहता है तो पिता के घर रहने का तेरा क्या अधिकार रहा । और जो तू अपने मन से" सची है तो पति के घर में दासी होकर भी रहना अच्छा है । अब तू यहीं ठहर । हम आश्रम को जाते हैं । दुष्य । हे तपस्वियो क्यों इसे झूठी आशा देते हो । देखो चन्द्रमा कमोदिनी ही को प्रसन्न करता है और सूर्य कमल ही को खिलाता है। ऐसे ही जितेन्द्रिय पुरुष पराई स्त्री से सदा बचे रहते हैं॥