पृष्ठ:Sakuntala in Hindi.pdf/८१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


ACT TI] SAKUNTALA. के चेले गये और शकुन्तला अपने भाग्य की निन्दा करती हुई वांह उठाकर रोने लगी . . . . ॥ दुष्य । तब क्या हुआ॥ पुरो । तब अप्सरातीर्थ के निकट स्त्री के रूप में कुछ बिजली सी 01 आई । सो शकुन्तला को उटा छाती से लगाकर ले गई ॥ (सब आर्य करने लगे) दुष्य । मुझे पहले ही भ्यास गई थी कि इस में कुछ छत्ल है । सो ई हुआ। अब इस बात में तर्क करना निष्फल है। तुम विश्राम करो॥ पुरो । महाराज की जय रहे ॥ (बाहर गया) दुष्य । हे द्वारपालिनी इस समय मेरा चित्त बहुत व्याकुल हो रहा है। आ तू । मुझे शयनस्थान को गैल बता ।। द्वारपालिनी । महाराज इस मार्ग आइये ॥ दुष्य° । (चलता हुआ आप ही प्राप) मैं बहुतेरा सुध करता हूं परंतु ध्यान में नहीं आता कि मुनिकन्या से कब मेरा विवाह हुआ। और हृदय उकताकर ऐसा हो गया है कि इस स्त्री के वचनों को प्रतीति करना चाहता है॥ अङ्क स्थान एक गली ॥ (कोतवाल और दो पियादे एक मनुप्प को बांधे हुए लाए) पहला पियादा । (धुर को पीटता हुआ) अरे कुम्भिलक बतला । यह अंगूठी जिस के हीरे' पर राजा का नाम खुदा है तेरे हाथ कहां से आई॥ कुम्भिलक । (कांपता हुला) मुझे मारो मत । मेरा ऐसा अपराध नहीं है जैसा तुम समझे हो ॥