पृष्ठ:Sakuntala in Hindi.pdf/८३

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ACT Y!.] SAKUNTALA. कुम्भि' । मुझ निरपराधी को क्यों मारना चाहिये । टू पियादा । देिखकर कोतवाल जी तौ वे" आते हैं । राजा ने भला" तुरंत ही निबेड़ा कर दिया । अव कुम्भिलक तू या तौ छूट ही जायगा नहीं तो कुत्तों गिद्धों का भक्षण बनेगा ॥ (कोतवाल फिर आया) कोत । धीमर को . . . . ॥ कुम्भिः । (घघराकर) हाय । अब मैं मरा ॥ कोत. । . . . . छोड़ दो । महाराज कहते हैं कि अंगूठी का वृत्तान्त हम जानते हैं। धीमर का कुछ अपराध नहीं है । इसे तुरंत छोड़ दो ॥ टू पियादा । जो आज्ञा" । आज यह चोर यम के घर से बच आया ॥ (छोड़ दिया) कुम्भिः । (हाथ जोड़कर) आप ही ने मेरे प्राण बचाए हैं । कोत । अरे जा । तरे भाग्य खुल गये । राजा की आज्ञा है कि अंगूटी का पूरा मोल तुझे मिले । सो यह ले ॥ (घेलो धोमर को दो) कुम्भि० । (हाथ जोड़कर) मैं इस समय अपने तन में फूला नहीं समाता इं प० पियादा । फूला क्यों समायगा। तू सूली से उतरकर हाथी पर चढ़ा है ॥ टू पियादा । राजा के प्रसन्न होने का क्या कारण है । अंगूठी तो कुछ ऐसी बड़ी वस्तु नहीं है" ॥ | कोत° । प्रसन्न होने का कुछ" यह भी कारण है कि अंगूठी बड़े मोल की है । परंतु मुख्य हेतु मुझे यह जान पड़ा कि अंगूठी को देखकर राजा को अपने किसी प्यारे की सुध आ गई । क्योंकि यद्यपि राजा का स्वभाव गम्भीर है तो भी जिस समय अंगूठी देखी विकल होकर मूर्छा आ गई॥ टू पियादा । तो आप ने राजा को बड़ा प्रसन्न किया ॥ )