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Act VI.]
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SAKUNTALÂ.


है तो भी ऐसी दिखाई देती है मानो आप का आदर करती है। आओ। चलकर बैठे ॥ (दोनो लता कुन्न में बैठे)

मिश्रकेशी । (आप ही आप)इस लता की ओट में बैठकर शकुन्तला का चित्र देखूगी । और फिर उस के पति का सचा स्नेह जाकर उस से कह दूंगी ॥ लताकी ओट में बैठ गई)

दुष्य० । (ठंडी स्वास भरके) हे मित्र अब मुझे शकुन्तला के प्रथम मिलाप की सब सुध आ गई है । तुझ से भी तो मैं ने उस का वृत्तान्त कहा था । परंतु जिस समय मैं ने उस का अनादर किया तब से मेरे पास न था । तें ने भी कभी उस का नाम न लिया । सो क्या तू भी उसे मेरी ही भांति भूल गया था ।

मिश्र० । (आप ही आप) राजाओं को एक घड़ी भर भी अकेला न छोड़ना चाहिये ॥

माढ० । नहीं नहीं । मैं नहीं भूला हूं। परंतु जब आप सब वृत्तान्त कह चुके थे तब यह भी तो कहा था कि यह स्नेह की कहानी हम ने मन बहलाने को बनाई है। और मैं ने आय के कहने को अपने भोले भाव से प्रतीत कर लिया था ॥

मिश्र० । (आप ही आप) सत्य है ।

दुष्य० । (ध्यान करके) हे माढव्य इस दुख से छुड़ाने का कुछ उपाय कर ॥

माढ० । ऐसा" तुम को क्या नया दुख पड़ा है। इतना अधीर होना सत्पुरुषों को योग्य नहीं है। देखो पवन कैसी ही चले पर्वत को नहीं डिगा सकती है।

दुष्य० । सखा जिस समय मैं ने प्यारी का त्याग किया उस की ऐसी दशा थी कि अब उस को सुध करके मैं व्याकुल हुआ जाता हूं। हाय जब उस ने अपने साथी ब्राह्मणों के पीछे चलने को मन किया ऋषि के चेले ने भिड़ककर कहा कि यहीं रह । फिर भी एक बेर प्यारी ने मुझ निर्देई की ओर आंसूभरे नेत्रों से देखा ।

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