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श्रीचंद्रावली

चन्द्रा०- सखी ! दूसरी होती तो मैं भी उससे यों एक संग न कह देती I तू तो मेरी आत्मा है । तू मेरा दुःख मिटावेगी कि उलटा समझावेगी १

ललिता-पर सखी ! एक बडे आश्चर्य की बात है कि जैसी तू इस समय दुखी है वैसी तू सर्वदा नही रहती

चन्द्रा०-नहीं सखी ! ऊपर से दुखी नही रहती पर मेरा जी जानता है जैसे रातें बीतती हैं । मनमोहन तें विछुरी जब सों,

   तन आँसुन तो सदा धोवती है।

'हरिचंद जू' प्रेम के फन्द परी,

   कुल की कुल लाजहि खोवती है॥

दुख दिन को कोऊ भाँति बितै,

   बिरहागम रैन सैजोवती है।

हमही अपुनी दशा जानै सखी, निसि सोवती हैं किधौ रोवती हैं ॥

ललिता-यह हो, पर मैने तुझे जब देखा तव एक ही दशा से देखा और सर्वदा तुझे अपनी आरसी वा किसी दर्पण मे मुँह देखते पाया पर वह मेद आज खुला । हैं तो वाही सोच मे बिचारत रही री काहे, दरपन हाथ ते न छिन बिसरत है । त्यौंही ' हरिचंद जू' वियोग औ सँजोग दोऊ, एक से तिहांरे कछु लखि न परत हैं।। जानी आज हम ठकुरानी तेरी बात, तू तौ परम पुनीत प्रेम पथ बिचरत है। तेरे नैन मृदुति पियारे की वर्सात, ताहि, आरसी मैं रैन-दिन देखियो करत है।। सखी ! तू धन्य हैं, बडी भारी प्रेमिन हैं और प्रेम शब्द सार्थ करनेवाली और प्रेमियों की मण्डली की शीभा है ।

चन्द्रा०-नहीं सखी ! ऐसा नही है । मै जो आरसी देखती थी उसका कारण कुछ दूसरा ही है । हा ! (लम्बी साँस लेकर) सखी ! मैं जब आरसी में अपना मुँह देखती और अपना रंग पीला पाती थी तब भगवान् से हाथ जोड़कर मनाती थी कि भगवान् ! मैं उस निर्दयी को चाहूँ पर वह मुझे न चाहे, हा ! (आँसू टपकते हैं)।