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श्रीचन्द्रावली

चन्द्रा―अहा! देखो उधर खड़े प्राणप्यारे मुझे बुलाते हैं तो चलो उधर ही चलें। (अपने आभरण सँवारती है)

(वर्षा और सन्ध्या पास आती है)

वर्षा०―(हाथ पकड़क) कहॉं चली सजि कै?―

चन्द्रा०―पियारे सों मिलन काज,―

वर्षा०―कहाँ तू खड़ी है?―

चन्द्रा०―प्यारे ही को यह घाम है।

वर्षा०―कहा कहै मुखसाें?―

चन्द्रा०―पियारे प्रान प्यारे―

वर्षा०―कहा काज है?

चन्द्रा०―पियारे साें मिलन मोहि काम है॥

वर्षा०―मैैं हूँ कौन बोल तौ?―

चन्द्रा०―हमारे प्रानप्यारे हौ न?―

वर्षा०―तू है कौन?―

चन्द्रा०―पीतम पियारो मेरो नाम है।

सन्ध्या―(आश्चर्य से) पूछत सखी एकै कै उत्तर बतावति जकी सि एक रुप आज श्यामा भई श्याम है।

(बनदेवी आकर चन्द्रावली की पीछे से आँख बन्द करती है)

चन्द्रा०―काैन है,काैन है?

बन०―मैैं हूँ।

चन्द्रा०―काैन तू है?

बन०―(सामने आकर) मैैं हूँ, तेरी सखी वृन्दा।

चन्द्रा०―तो मैैं काैन हूँ?

बन०―तू तो मेरी प्यारी सखी चन्द्रावली है न? तू अपने हू को भूल गई।

चन्द्रा०―तो हम लोग अकेले बन मे क्या कर रही है?

बन०―तू तो प्राणनाथै खोजि रही है न?

चन्द्रा०―हा! प्राणनाथ! हा! प्यारे!प्यारे! अकेले छोड़के कहाँ चले गए? नाथ! एसी ही बदी थी! प्यारे यह वन इसी विरह का दुःख करने के हेतु बना है कि तुम्हारे साथ बिहार करने को? हा!


जो पैं ऐसिहि करन रही।
तो फिर क्यो अपने सुख सों तुम रस की बात कही॥