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श्रीचन्द्रावली

नाटिका

स्थान- रंगशाला (ब्राह्मण आशीर्वाद पाठ करता हुआ आया) भारत नेह नव नीर नित, बरसत सुरस अथोर । जयति अलौकिक धन कोऊ, लखि नाचत मन मोर ॥ और भी नेति नेति तत-शब्द-प्रतिपाध्य सर्व भगवान । चन्द्रावली-चकोर श्रीकृष्ण करो कल्यान ॥ (सूत्रधार आत है)

सूत्र०- बस बस, बहुत बढ़ाने का कुछ काम नही। मारिप!! मारिप!! दौडो

दौडो, आज ऐसा अच्छा अवसर फिर न मिलेगा, हम लोग अपना गुण दिखाकर आज निश्चय कृतकृत्य होंगे ।

परिपारर्वक आकार पारि०- कहो कहो आज क्यों ऐसे प्रसन्न हो रहे हो? कौनसा नाटक करने का विचार है और उसमें ऐसा कौन सा रस है कि फूले नही समाते ? सूत्र०- आः, तुमने अबतक न जाना ? आज मेरा विचार है कि इस समय के बने एक नए नाटक की लीला करू, क्योंकि संस्कृत नाटकों को अपनी भाषा में अनुवाद करके तो हम लोग अनेक बार खेल चुके है, फिर बारबार उन्हीं के खेलने को जी नही चहता। पारि०- तुमने बात तो बहुत अच्छि सोची, वाह क्यों न हो, पर यह तो कहो कि वह नातक बनाया किसने है ? सूत्र०-हम लोगों के परम मित्र हरिश्चन्द्र ने । पारि०-(मुँह फेर कर) किसी समय तुम्हारी बुद्धि में भी भ्रम हो जाता है। भला वह नाटक बनाना क्या जाने ! वह तो केवल आरम्भ शूर है । और अनेक बड़े बड़े कवि है, कोई उनका प्रबन्ध खेलते ।