पृष्ठ:Shri Chandravali - Bharatendu Harschandra - 1933.pdf/३४

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                        === श्रीचन्द्रावली ===

हाय! यह न समझा था कि यह परिणाम करोगे। वाह! खूब निबाह किया। बधिक भी बधकर सुध लेता है, पर तुमने न सुध ली। हाय। एक बेर तो आकर अक मे लगा जाओ। प्यारे, जीते जी आदमी का गुन नहीं मालूम होता। हाय! फिर तुमहारे मिलने को कौन तरसेगा और कौन रोयेगा। हाय! संसार छोड़ा भी नहीं जाता। सब दुःख सहती हूँ, पर इसी मेँ फँसी पडी हूँ। हाय नाथ! चारों ओर से जकड़ कर् ऐसी बेकाम क्यों कस डाली है। प्यारे, यों ही रोते दिन बीतेंगे। नाथ! यह हौस मन की मन ही में रह जायगी। प्यारे, प्रगट होकर संसार का मुँह क्यों नहीं बन्द करते और क्यों शंकाद्वार खुला रखते हो? प्यारे, सब दीनदयालुता कहाँ गई! प्यारे, जल्दी इस संसार से छुड़ाओ। अब नहीं सही जाती। प्यारे, जैसी है, तुम्हारी हैं। प्यारे, अपने कनौड़े को जगत की कनौड़ी मत बनाओ। नाथ! जहाँ इतने गुन सीखे वहाँ प्रीती निबाहना क्यो न सीखा? हाय! मँझधार में डुबाकर ऊपर से उतराई माँगते हो; प्यारे सो भी दे चुकी, अब तो पार लगाओ। प्यारे, सबकी हद होती है। हाय! हम तड़पे और तुम तमाशा देखो। जन-कुटुम्ब से छुड़ाकर यो छितर-बितर करके बेकाम् कर देना यह कौन बात है। हाय! सबकी आँखों मे हलकी हो गई। जहाँ जाओ वहाँ दुर-दुर, उस पर यह गति! हाय! "भामिनी ते भौड़ी करी, मानिनी तें भौड़ी करी, कौड़ी करी हीरा तें, कनौड़ी करी कुल तें।" तुम पर बड़ा क्रोध आता है और कुछ कहने को जी चाहता है। बस अब मैं गाली दूँगी। और क्या कहूँ, बस आप आप ही हौ, देखो गाली में भी तुम्हें मर्मवाक्य कहूँगी- झूठे, निर्दय, निर्घृण, "निर्दय हृदय कपाट", बखेड़िये और निर्लज्ज, यह सब तुम्हें सच्ची गालियाँ हें, भला जो कुछ् करना ही नहीं था तो इतना क्यों झुठ बके? किसने बकाया था? कूद-कूदकर प्रतिज्ञा करने बिना क्या डूबी जाती थी? झूठे! झूठ!! झूठे!!! झूठे ही नहीं वरन्च विशवासघातक! क्यों इतनी छाती ठोंकऔर हाथ उठा-उठाकर लोगों को विश्वास दिया? आप ही सब मरते चाहे जहन्नुम में पड़ते, और उस पर तूर्रा यह है कि किसी को चाहे कितना भी दुखी देखें आपको कुछ घृणा तो होती ही नहीं। हाय-हाय कैसे-कैसे दुखी लोग हैं---और मजा तो यह है कि सब धान बाइस पसेरी। चाहे आपके वास्ते दुखी हो, चाहे अपने संसार के दु:ख से; आपको दोनों उल्लू फँसे हैं। इसीसे तो "निर्दय हृदय कपाट" यह नाम है। भला क्या काम था कि इतना पचड़ा किया? किसने इस उपद्रव और जाल करने को कहा था?