पृष्ठ:Shri Chandravali - Bharatendu Harschandra - 1933.pdf/३८

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श्रीचन्द्रावली

३८ श्रीचन्द्रावली देखि-देखि दामिनो की दुगुन दमक पीत- पट-छोर मेरे हिय फहरि-फहरि उठे । हाय ! जो बरसात संसार को सुखद है वह मुझे इतनी दुखदायिनी हो (सब जाती हैं) माधवी-तौ न दुखदायिनी होयगी चल उठि घर चलि । का• मं०-हाँ, चलि। (जवनिका गिरती है) ॥ वर्षा-वियोग-विपत्ति नामक तृतीय अंक ॥