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श्रीचन्द्रावली

४२ श्रीचन्द्रावली चक्रवाक कहुँ बसत कहूँ बक ध्यान लगावत । सुक पिक जल कहुँ पियत कहूँ भ्रमरावलि गावत ।। कहुँ तट पर नाचत मोर बहु रोर बिबिध पच्छी करत । जलपान न्हान करि मुख भरे तट सोभा सब जिय धरत ।। कहूँ बालुका बिमल सकल कोमल बहु छाई । उज्ज्ल झलकत रजत सिढ़ी मनु सरस सुहाई ।। पिय के आगम हेत पॉवड़े मनहुँ बिछाए । रत्नरासि करि चूर कुल मै मनु बगराए ।। मनु मुक्त माँग सोभित भरो श्यामनीर चिकुरन परसि | सतगुन छायो के तीर में ब्रज निवास लखि हिय हरसि ।। (चन्द्रावली अचानक आती है) चन्द्रा०-वाह वाहरी बेहना आजु तो बड़ी कबिता करी । कबिताई की मोट की मोट खोलि दीनी । मैं सब छिप छिपें सुनती थी। (दबे पाँव से जोगिन आकर एक कोने में खड़ी हो जाती है) ललिता-भलो-भलो बीर, तोहि कबिता सुनिबे की मुधि तो आई, हमारे इतनोई बहुत है। चन्द्रा०-(सुनते ही स्मरणपूर्वक लम्बी सॉस लेकर) सखी री क्यों मुधि मोहि दिवाई । ही अपने गृह-कारज भूली भूलि रही बिलमाई ।। फेर वहै मन भयो जात अब मरिहों जिय अकुलाई। हो तबही लौं जगत-काज की जब लौं रहीं भुलाई ।। ललिता-जल जान दे, दूसरी बात कर । जोगिन-(आप ही आप) निस्संदेह इसका प्रेम पक्का है, देखो मेरी सुधि आते ही इसके कपोलों पर कैसी एक माथ जरदी दौड़ गयी । नेत्रों में आँसुओं का प्रवाह उमग आया। मुँह सूग्बकर छोटा-सा हो गया । हाय ! एक ही पल में यह तो कुछ की कुछ हो गयी। अरे इसकी तो यही गति है- छरी-सी छकी-सी जड़ भई-सी जकी-सी घर हारी-सी बिकी-सी सो तो सबही घरी रहै। बोले तें न बोलै दृग खोले नाहि डोलै बैठी एकटक देग्वै सो खिलौना-सी धरी रहै।