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श्रीचन्द्रावली

श्रीचन्द्रावली जोगिन-अपने पिय के काज । ललिता-मंत्र कौन ? जोगिन-पियनाम इक , ललिता-कहा तज्यो ? जोगिन-जग-लाज ॥ ललिता-आसन कित ? जोगिन-जितही रमे, ललिता-पंथ कौन ? जोगिन-अनुराग। ललिता-साधन कौन ? जोगिन-पिया-मिलन, ललिता-गादी कौन ? जोगिन-सुहाग ॥ नैन कहें गुरु मन दियो बिरह सिद्धि उपदेस । तब सों सब कुछ छोड़ि हम फिरत देस-परदेस ।। चन्द्रा०—(आप ही आप) हाय ! यह भी कोई बड़ी भारी बियोगिन है तभी इसकी ओर मेरा मन आपसे आप खिंचा जाता है । ललिता-तौ संसार को जोग तो और ही रकम को है और आप को तो पंथ ही दूसरो है । तो भला हम यह पूछ कि का ससार के और जोगी लोग वृथा जोग साधे हैं ? जोगिन-यामैं का सन्देह है, सुनो । (सारंगी छेड़कर गाती है) पचि मरत वृथा सब लोग जोग सिर धारी । साँची जोगिन पिय बिना बियोगिन नारी || बिरहागिन धूनी चारों ओर लगाई। बसी धुनि की मुद्रा कानो पहिराई ।। अमुअन की सेली गल में लगत सुहाई । तन धूर जमी सोइ अंग भभूत रमाई ।। लट उरझि रही सोइ लटकाई लट कारी । साँची जोगिन पिय बिना बियोगिन नारी ॥ गुरु बिरह दियो उपदेस सुनो ब्रजबाला । पिय बिठुरन दुख बिछाओ तुम मृगछाला ||