पृष्ठ:Shri Chandravali - Bharatendu Harschandra - 1933.pdf/४८

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४८ श्रीचन्द्रावली और बढ़े हुए मनोरथों को किस को सुनावें जो काव्य के एक-एक तुक और संगीत की एक-एक तान से लाख-लाखगुन बढ़ते हैं और तुम्हारे मधुर रूप और चरित्र के ध्यान से अपने आप ऐसे उज्ज्वल सरस और प्रेममय हो जाते है, मानो सब प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे है । पर हा ! अन्त मे करुण रस में उनकी समाप्ति होती है क्योकि शरीर की सुधि आते ही एक. साथ बेबसी का समुद्र उमड़ पड़ता है । जोगिन-वाह अब यह क्या सोच रही हो ! गाओ ले, अब नही मानेंगी। ललिता-हॉ सखी, अब अपना वचन सच कर । चन्द्रा०-(अोन्माद की भाँति) हाँ हाँ, मैं गाती हूँ। (कभी ऑसू भरकर, कभी कई बेर, कभी टहरकर, कभी भाव बताकर, कभी बेसुर-ताल ही, कभी ठीक-ठीक, कभी टूटी आवाज से पागल की भॉति गाती है) मन की कामों पीर सुनाऊँ । बकनो वृथा और पत खोनी सबै चवाई गाऊँ । कठिन दरद कोऊ नहिं हरिहै धरिहै उलटो नाऊँ । यह तो जो जानै सोइ जाने क्यों करि प्रगट जनाऊँ । रोम-रोम प्रति नैन श्रवन मन केहि धुनि रूप लखाऊँ । बिना सुजान-शिरोमनि री केहि हियरो काढ़ि दिखाऊं ॥ मरमिन सखिन बियोग-दुखिन क्यों कहि निज दसा रोआऊँ। 'हरीचंद' पिय मिले तो पग परि गहि पटुका समझाऊँ ।। (गाते-गाते बेसुध होकर गिरा चाहती है कि एक बिजली सी चमकती है और जोगिन श्रीकृष्ण बनकर उठाकर गले लगाती है और नेपथ्य में बाजे बजते हैं) ललिता--(बड़े आनंद से) सखी बधाई है, लाखन बधाई है । ले होस में आ जा!. देख तो कौन तुझे गोद लिए हैं ! चन्द्रा०-(उन्माद की भाँति भगवान् के गले में लपटकर) पिय तोहि राखौंगी भुजन मैं बॉधि । जान न दैहौँ तोहि पियारे धरौंगी हिए सो नाँधि । बाहर गर लगाइ राखौंगी अंतर करौंगी समाधि । 'हरीचंद' छूटन नहिं पैही लाल चतुराई साधि ॥ पिय तोहि कैसे हिये राखौं छिपाय ? सुन्दर रूप लखत सब कोऊ यह कसक जिय आय ॥