पृष्ठ:Shri Chandravali - Bharatendu Harschandra - 1933.pdf/४९

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      श्रीचन्द्रऱवली 

नैनन में पुतरी करि रांखौं पलकन ओट दुराय। हियरे में मनहूँ के अंतर कैसे लेउँ लुकाय ॥ मेरो भाग रूप पिय तुमरो छीनत सौतैं हाय । 'हरीचंद' जीवनधन मेरे छिपत न क्यौं इत धाय ॥ पिय तुम और कहूँ जिन जाहू । लेन देहु किन मो रंक्रिन को रूप-सुधा-रस-लाहु ॥ जो-जो कहौ करौं सोइ सोई धरि जिय अमित उछाहु ॥ राखौं हिये लगाइ पिबारे किन मन माहिं समाहु ॥ अनुदिन सुंदर बदन-सुधानिधि नैन चकोर दिखाहु । 'हरीचंद' पलकन की ओटे छिनहु न नाथ दुराहु ॥ पिय तोहि कैसे बस करि रखौं । तुव दृग मैं दृग तुव हिय मैं निज हियरो केहि बिधि नाखौं । कहा करौं का जतन बिचारों बिनती केहि बिधि भाखौं । 'हरीचंद' प्यासी जनमन की अधरसुघा किमि चाखौं ॥ भगवान्-तौ प्यारी मैं तोहि छोड़िकै कहाँ जाउँगो, तू तौ मेरी स्वरूप ही है । यह सब प्रेम की शिक्षा करिबे कों तेरी लीला है । ललिता-अहा ! इस समय जो मुझे आनंद हुआ है उसका अनुभव और कौन कर सकता है । जो आनंद चंद्रावली को हुआ है वही अनुभव मुझे भी होता है । सच है, जुगल के अनुग्रह बिना इस अकथ आनंद का अनुभव और किसको है ? चन्द्रा०-पर नाथ, ऐसे निठुर क्यों हों ? अपनों को तुम कैसे दुखी देख सकते हो ? हा ! लाखों बातें सोची थीं कि जब कभी पाऊँगी तो यह कहूँगी, यह पूछूँगी, पर आज सामने कुछ नहीं पूछा जाता ! भग०-प्यारी ! मैं निटुर नहीं हूँ । मैं तो अपने प्रेमिन को बिना मोल को दास हूँ । परतु मोहि निहचै है कै हमारे प्रेमिन को हम सों हूँ हमारो बिरह प्यारी है । ताही सों मैं हूँ बचाय जाऊँ हूँ । या निठुरता मैं जे प्रेमी है विन को तो प्रेम और बढ़ै और जे कच्चे हैं विनकी बात खुल जाय । सो प्यारी यह बात हू दूसरेन कीं है । तुमारो का, तुम और हम तो एक ही हैं । न तुम हम सों जुदी हो न प्यारीजू सों । हमने तो पहिले ही कही कि यह सब लीला है । (हाथ जोड़कर) प्यारी, छिमा करियो, हम तो तुम्हारे जाम-जनम के रिनियाँ हैं । तुमसे हम कभू उरिन होइवेई के नहीं । (आँखों में आँसू भर आते हैं) ।