पृष्ठ:Shri Chandravali - Bharatendu Harschandra - 1933.pdf/६१

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                        श्रीचन्द्रावली

लोकलाज...होय सो होय-पुष्टिमार्गीय भक्ति के अनुसार ही यह कथन है। मुरि-मुड कर। छाम-क्षीण। कलाम-प्रतिज्ञा। हुती-थी। सूधी-सीधी। साधै-इच्छा। अनखाना-क्रुध्द होना, रिसाना। सुभाय-स्वभाव,प्रकृति। 'अच्छा लगना' अर्थ भी हो सकता है-'भाना' से (इस प्रकार करके अर्थत दया न लाकर क्या तुम अच्छे लगते हो)। सात पैर-सप्तपदी-विवाह समय की सात फेरी। कित कौ ढरिगो-कहॉ चला गया। साजत हौ-सजाते हो अर्थत प्रदर्शित करते हो। अनवोलिबे में नहिं छाजत हौ-अनवोलिबे में-न बोलने में। छाजना-शोभा देना। दुरि-छिप कर। बिरुदावली-यश, अर्थात अपनी शरण में आए की रक्षा करते हो यह यश। हात-हाथ। कछू हात नहीं-कुछ हाथ नहीं लगता, मतलब नहीं निकलता। जलपान कै पूछनी जात नही-पानी पी कर जाति नहीं पूछनी चाहिए। भारवौ-कहो। औधि-अवधि। देखि लोजौ...रहि जायेंगी-दर्शन की लालसा से आँखों का खुला रह जाना कहा गया है। अमृत पीकर फिर छाछ कैसे पियेंगी-छाछ-मठ्टा। उत्तम वस्तु ग्रहण करने के बाद निकृष्ट वस्तु कौन ग्रहण करेगा अर्थात तुम्हारे सामने अब कौन अच्छा लगेगा। पेखिए का-पेखिए-देखिए। का- क्या। संगम-संयोग, मिलन। तुच्छन- तुच्छ सुखों को। हरिचंद जू हीरन...लै परेखिए का-परेखना-जाँचना। हीरों का व्यवहार कर काँच को क्या जाँचे। 'अमृत पीकर फिर छाछ कैसे पियेंगी, वाला भाव है।