पृष्ठ:Shri Chandravali - Bharatendu Harschandra - 1933.pdf/६२

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                       श्रीचन्द्राबली

जिन आँखिन में...अब देखिए का-अर्थात आपका सौन्दर्य देखने के बाद अब कुछ देखने को शोप नहीं रह जाता। राजा चन्द्रभानु-गोपो के राजा चन्द्रभानु। ह्याँई-यहाँ ही। वन के स्वामी-वन-कदली वन। कदली वन के स्वामी श्रीकृष्ण। यासूँ-इससे। अपने सौ बाहर होय रही है-अपनी सीमा या मर्यादा से बाहर हो रही है अर्थात होश हवास दुरूस्त नही है। अलख लडैती-अलख-जो दिखाई न पडे, ईश्वर का एक विशेषण। लढैती-लाडली, अर्थात ईश्वर की लाडली- एक प्रकार का लाडभरा संबोधन। मेरा लुटेरा-मेरा सर्वस्व अपहरण करनेवाला। रूख-वृक्ष। कितै-किधर। कदंब-कदम,एक प्रसिध्द वृक्ष। अंब-निष-आम और नीम। बकुल-मौलसिरी। तमाल-एक बहुत ऊँचा सुन्दर सदाबहार वृक्ष। बिरुध-पौधा। जकी-सी-स्तंभित सी, चकित सी। एक रूप आज श्यामा भैइ श्याम है-श्याम और श्यामा (यहाँ चन्द्रावली) आज एकरूप हो गए हैं-अभिन्नता। बदी थी-निश्रित हुआ था, या स्वीकार किया था। निबही-निभी, निर्वाह हुआ। अनत-अन्यत्र और कहीं। गरजना इधर और बरसना और कहीं-अर्थात तडपाना यहाँ और रस-वर्पा कहों और करना। चातक-पपोहा। पानिप-पानी। प्यारे!चाहे गरजो चाहे लरजो...तुम्हीं अवलंब हौ;हा!-इन पंक्तियों से पुष्टिमार्गीय भक्त की एकांत भक्ति की ओर संकेत मिलता है। श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी में वह अनुरक्त नहीं हता। पुष्टिमार्गीय भक्त निश्चिन्त रहता है, वह सन्तोषी होता है और इस बात में विश्वास रखता है कि स्वयं भगवान ही उसकी सब इच्छाएँ पूर्ण करेंगे।