पृष्ठ:Shri Chandravali - Bharatendu Harschandra - 1933.pdf/६६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
६६
श्रीचन्द्रावली


                       श्रीचन्द्रावली

निगोढा-नीच, द्रष्ट। एक प्रकार की गली। कुल की मरजाद...चढाई है-वर्पाकालोन श्रगारपूर्ण वातावरण में वंशमर्यादा की रक्षा करना कठिन है। कमिनी-कामवती स्त्री। बावली-चौडे मुंह का कुआं जिसमे पानी तक पहुंचने के लिए सीढियाँ बनी हो, छोटा गहरा तालाब। सकपके से-चकित से। बीर बहूटी-गहरे लाल रंग का एक छोटा रगनेवाला एक कीडा, इन्द्रवधू। पारी-पारी-बारी-बारी। करारा-नदी का वह ऊँचा किनारा जो जल के काटने से बने। पडे-पडे पछता रहे हैं-वर्पा के कारण मार्ग बन्द हो जाने से। वियोगियों को...आया है-वर्पा काल मे विरह ओर भी तीर्व हो जाता है। लाज के...प्रलय ही ठहरा-जब लजा ही नहीं रही तो जीवन में फिर शेप ही क्य रहा, सब-कुछ नष्ट हो गय। गारद-गारत,नष्ट,बरबाद। बटे कृष्ण-वटवाले कृष्ण, उनकी मूर्ति या मन्दिर। भांडीर वट-भांडीर-व्रज के एक वन का नाम, वहाँ का वट। झंखना-झीखना, दुस्त्रडा रोना। पुरवैया-जा पूर्व से चलती है। लरजना-काँपना, हिलना। एकतार-लगातार। झमाका-पानी बरसने का झमझम शब्द। ठठोलिन-हँसी दिल्लगी करने वाली, मसखरी। खुमारी-नशा। ऍसी कच्ची नहीं कि थोडे में बहुत उचल पडे-अर्थात मैं इतनी कमजोर नहीं कि थोडी सी उत्तेजना पाते ही अपना संयम खो दें। बिसात-हैसियत। तूमढी तोढ-तोढ कर-तूमडी-तूँवा जिसे प्रायः साधु अपने पास रखते हैं। वर्षाकालीन वातावरण में योगियों का संयम भी टूट जाता है और वे अपने तूँबे को फेक-फाक कर भोगी बन जाते हैं किसी सिध्द से कान फुँकवाकर तुमडी तोढवा ले-सिध्द-जिसने योग या तप से सिध्दि-लाभ की हो। यहाँ साधारण साधु से मतलब है। कान