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श्रीचन्द्रावली

श्रीचन्द्रावली ७१ भला क्या काम था...विषमय संसार किया-परब्रह्म श्रीकृष्ण तो आनन्दमात्र हैं, आनन्दस्वरूप हैं, किन्तु उनका आविर्भाव-तिरोमाव होता रहता है । विषमय-अविद्या आदि दोषों से लिप्त । बड़े कारखाने पर बेहयाई परले सिरे की-बड़ा कारखाना-संसार । बेहयाई परले सिरे की-हद दरजे की बेहयाई | जितना बड़ा कारखाना उतनी ही हद दरजे की बेह्याई । न तो झूठे कहलाने से डरते हो, और न अपना वचन ही पूर्ण करते हो। नाम बिके-अत्यधिक प्रसिद्ध हो-चाहे झूठे और बेहया ही प्रसिद्ध हो । भगवान चाहे भक्तों की रक्षा करें या न करें, अपना वचन पूर्ण कर या न करे उनको तो सभी जपते हैं । झूठा कहें-अर्थात् भक्तों को दिए गए वचन का पालन न करें । अपने मारे फिरें-भटकते फिर । भक्ति का सच्चा मार्ग दिखाई न दे । शुद्ध बेहयाई-जिसमें बेहयाई के सिवाय और कुछ न हो। लाज को...दिया है-लाज को अपमानित करके बिल्कुल निकाल दिया है, ___ अर्थात स्वयं निलंज, बेहया हो । जिस मुहल्ले में नहीं जाती-वही निर्लजता का भाव है । भगवान् श्रीकृष्ण का मुहल्ला वैकुण्ट ही हो सकता है । मत-वाले मतवाले.. सिर फोड़ते-मत-वाले-विभिन्न धर्मावलम्बी । मतवाले- पागल । सब धर्मावलम्बी अपने-अपने ढंग से ईश्वर का निरूपण कर आपस में लड़ते हैं । यदि ईश्वर दिखाई पड जायँ तो झगड़ा क्यों हो । अँधे और हाथीवाली कथा चरितार्थ होती है । जब ऐसे हो तब ऐसे हो-अर्थात् जब ऐसे निदनीय हों तब तो हमे मुग्ध कर रखी है । जब निंदनीय न होते तब न जाने क्या करते । हुकमी वेहया-अचूक, न चूकनेवाले बेहया । माथा खाली करना-इतना अधिक कहना या बोलना । हम भी तो "झूठी हैं-चन्द्रावली ने भी लोक-लाज आदि छोड़कर, घरवालों ___ से बचकर, बिना किसी की परवा कर श्रीकृष्ण से प्रीति की है। जस दूलह तस बनी बराता-जैसे को तैसा साथी । मूल उपद्रव तुम्हारा है-तुम्ही इस सृष्टि के मूल कारण हो, अथवा तुम्हारे ही ___ सौन्दर्य ने हमें मुग्ध कर यह उपद्रव खड़ा किया है। इतना और कोई न कहेगा-जितने वास्तविक गुणों का मैंने बखान किया है उतना कोई और नहीं करेगा।