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श्रीचन्द्रावली

भला क्या काम था...विषमय संसार किया—परब्रह्म श्रीकृष्ण तो आनन्दमात्र हैं, आनन्दस्वरूप हैं, किन्तु उनका आविर्भाव-तिरोमाव होता रहता है।

विषमय—अविद्या आदि दोषों से लिप्त।

बड़े कारखाने पर बेहयाई परले सिरे की—बड़ा कारखाना— संसार। बेहयाई परले सिरे की—हद दरजे की बेहयाई। जितना बड़ा कारखाना उतनी ही हद दरजे की बेह्याई। न तो झूठे कहलाने से डरते हो, और न अपना वचन ही पूर्ण करते हो।

नाम बिके―अत्यधिक प्रसिद्ध हों―चाहे झूठे और बेहया ही प्रसिद्ध हों। भगवान चाहे भक्तों की रक्षा करें या न करें, अपना वचन पूर्ण करे या न करे उनको तो सभी जपते हैं।

झूठा कहें―अर्थात् भक्तों को दिए गए वचन का पालन न करें।

अपने मारे फिरें―भटकते फिर। भक्ति का सच्चा मार्ग दिखाई न दे।

शुद्ध बेहयाई―जिसमें बेहयाई के सिवाय और कुछ न हो।

लाज को...दिया है―लाज को अपमानित करके बिल्कुल निकाल दिया है, अर्थात स्वयं निर्लज, बेहया हो।

जिस मुहल्ले में...नहीं जाती―वही निर्लजता का भाव है। भगवान् श्रीकृष्ण का मुहल्ला वैकुण्ट ही हो सकता है।

मत-वाले मतवाले...सिर फोड़ते―मत-वाले―विभिन्न धर्मावलम्बी। मतवाले―पागल। सब धर्मावलम्बी अपने-अपने ढंग से ईश्वर का निरूपण कर आपस में लड़ते हैं। यदि ईश्वर दिखाई पड जायँ तो झगड़ा क्यों हो। अँधे और हाथीवाली कथा चरितार्थ होती है।

जब ऐसे हो तब ऐसे हो―अर्थात् जब ऐसे निदनीय हों तब तो हमे मुग्ध कर रखी है। जब निंदनीय न होते तब न जाने क्या करते।

हुकमी वेहया―अचूक, न चूकनेवाले बेहया।

माथा खाली करना―इतना अधिक कहना या बोलना।

हम भी तो...झूठी हैं―चन्द्रावली ने भी लोक-लाज आदि छोड़कर, घरवालों से बचकर, बिना किसी की परवा कर श्रीकृष्ण से प्रीति की है।

जस दूलह तस बनी बराता―जैसे को तैसा साथी।

मूल उपद्रव तुम्हारा है―तुम्ही इस सृष्टि के मूल कारण हो, अथवा तुम्हारे ही सौन्दर्य ने हमें मुग्ध कर यह उपद्रव खड़ा किया है।

इतना और कोई न कहेगा―जितने वास्तविक गुणों का मैंने बखान किया है उतना कोई और नहीं करेगा।