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श्रीचन्द्रावली

सिफारिशी नेति-नेति कहेंगे—शास्त्रीय या मर्यादा मार्ग से किसी पद पर पहुँचे हुए लोग तुहारा ‘अंत नहीं है, अंत नहीं है’ कहकर वर्णन करते हैं, सच्चा वास्तविक रूप नहीं बताते।

दुःखमय पचढ़ा―दुःखमय संसार (पचड़ा, प्रपंच, बखेड़ा)।

जंगल में मोर नाचा किसने देखा―चुपचाप किए गए काम को कौन जानता है। मेरी मूक पीड़ा को कौन जानता है।

वह―परब्रह्म स्वरूप श्रीकृष्ण।

मेरे अपराधों...अपनी ओर देखो―अर्थात् अपराधों या दोषों या पापकर्मों की ओर न देखकर अपने शरणागत वत्सलता वाले यश की ओर देखो। तुमने न मालूम कितने पापी तारे हैं।

सोंह―सौगन्ध।

प्रिया जी―श्रीमतीजी (राधा), ज्येष्ठा नायिका।

हा हा खाऊँँ―मिन्नत करूँ।

ताई―तक।

सल्लाह―सलाह।

प्यारी जू―श्रीमतीजी (राधा), ज्येष्ठा नायिका।

घरके न सों याकी सफाई करावै―घरवालों से इसकी निदोपता सिद्ध करावे, कलंक का दोषारोपण हटवावे।

लालजी―श्रीकृष्ण।

विन्ने―उन्हें।

जब तक साँसा तब तक आसा―अंत समय तक आशा रखनी चाहिए।

काहुवै―किसी को भी।

अनमनोपन―खिन्नता उदासी।

मेरे तो नेत्र...करते हैं―मेरे नेत्रों के हिंडोरे में श्रीकृष्ण झूला करते हैं। पल पटुली―पलक रूपी पटुली।

चारु―सुन्दर।

झुमका―गोल लटकन।

झालर―लटकता हुआ किनारा।

झूमि―झूमकर।

ललित―सुन्दर।

काम पूरन―काम से पूर्ण।

उछाह―उत्साह।