पृष्ठ:Shri Chandravali - Bharatendu Harschandra - 1933.pdf/७२

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श्रीचन्द्रावली

७२ श्रीचन्द्रावली सिफारिशी नेति-नेति कहेंगे-शास्त्रीय या मर्यादा मार्ग से किसी पद पर पहुँचे हुए लोग तुहारा 'अंत नहीं है, अंत नहीं है' कहकर वर्णन करते हैं, सच्चा वास्तविक रूप नहीं बताते । दुःखमय पचड़ा-दुःखमय संसार (पचड़ा, प्रपंच, बखेड़ा)। जंगल में मोर नाचा किसने देखा-चुपचाप किए गए काम को कौन जानता है । मेरी मूक पीड़ा को कौन जानता है । वह-परब्रह्म स्वरूप श्रीकृष्ण । मेरे अपराधों...अपनी ओर देखो-अर्थात् अपराधों या दोपों या पापकर्मों की ओर न देखकर अपने शरणागत वत्सलता वाले यश की ओर देखो | तुमने न मालूम कितने पापी तारे हैं । सोह-सौगन्ध । प्रिया जी-श्रीमतीजी (राधा), ज्येष्ठा नायिका । हा हा खाऊ-मिन्नत करूँ। ताई-तक । सल्लाह-सलाह । प्यारी जू-श्रीमतीजी (राधा), ज्येष्ठा नायिका । घरके न सों याकी सफाई करावै-घरवालों से इसकी निदोपता सिद्ध करावे, कलंक का दोषारोपण हटवावे । लालजी-श्रीकृष्ण । विने-उन्हें । जब तक साँसा तब तक आसा-अंत समय तक आशा रखनी चाहिए । काहुवै-किसी को भी। अनमनोपन-खिन्नता उदासी । मेरे तो नेत्र...करते हैं-मेरे नेत्रों के हिंडोरे में श्रीकृष्ण झूला करते हैं । पल पटुली-पलक रूपी पटुली । चारु-सुन्दर । झुमका--गोल लटकन । झालर-लटकता हुआ किनारा । झूमि-झूमकर । ललित-सुन्दर । काम पूरन-काम से पूर्ण । उछाह-उत्साह ।