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श्रीचन्द्रावली

७४ श्रीचन्द्रावली ढरारी-बहनेवाली। बूंघरवारी-धुंधराली। बागे-वस्त्र (वैसे 'जामा' या 'अंग के तरह का पहिनावा')। सिराई-शीतल हुई। पेंजनी-झन झन बजनेवाला एक गहना जो पैर में पहना जाता है । तरनि-तनूजा-तरनि-सूर्य । तनूजा-पुत्री । सूर्य की पुत्रो अर्थात् यमुना ।' मुकुर-देषण । प्रनवत-प्रणाम करते हैं। आतप-बारन-गर्मी दूर करने के लिए । नै रहे-के हुए है। अमल-स्वच्छ। सेवालन-सिवार । गोभा-अंकुर । ढिंग-पास । उपचार-विधान, पृजन के अग या विधान जो प्रधानतः सोलह माने जाते है । भृङ्ग-भौरा । कमला-लक्ष्मो । सात्विक अरु अनुराग-सात्विक-शृगार के अतर्गत, सात्विक भाव--स्तंभ, स्वेद, रोमाच, कंप, अश्र आदि जो निसर्ग जात अग विकार है । अनुराग-- प्रीति, प्रेम । वगरे फिरत-फैले हुए है । सतधा-सौ ओर प्रधावित हो कर, सौ तरह से । राका-पूर्णिमा की रात्रि । तान तनावति-तनाव तनाती है । ओभा-आमा । जुड़ावत-शीतल होते हैं। इकसी-एकसी। लोल-चंचल । रास-रमन-रास-क्रीड़ा। ता-उसका । गवन-गमन, चलना । बालगुडी-छोटी गुड्डी (पतंग)।