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श्रीचन्द्रावली

ढरारी―बहनेवाली।

घूंघरवारी―घुँघराली।

बागे―वस्त्र (वैसे 'जामा' या 'अंगे के तरह का पहिनावा')।

सिराई―शीतल हुई।

पेंजनी―झन झन बजनेवाला एक गहना जो पैर में पहना जाता है।

तरनि-तनूजा―तरनि―सूर्य। तनूजा―पुत्री। सूर्य की पुत्री अर्थात् यमुना।

मुकुर―दर्पण।

प्रनवत―प्रणाम करते हैं।

आतप-बारन―गर्मी दूर करने के लिए।

नै रहे―झुके हुए है।

अमल―स्वच्छ।

सेवालन―सिवार।

गोभा―अंकुर।

ढिंग―पास।

उपचार―विधान, पूजन के अग या विधान जो प्रधानतः सोलह माने जाते है।

भृङ्ग―भौंरा।

कमला―लक्ष्मी।

सात्विक अरु अनुराग―सात्विक―श्रृगार के अंंतर्गत, सात्विक भाव―स्तंभ, स्वेद, रोमाच, कंप, अश्रु आदि जो निसर्ग जात अग विकार है। अनुराग―प्रीति, प्रेम।

वगरे फिरत―फैले हुए है।

सतधा―सौ ओर प्रधावित हो कर, सौ तरह से।

राका―पूर्णिमा की रात्रि।

तान तनावति―तनाव तनाती है।

ओभा―आभा।

जुड़ावत―शीतल होते हैं।

इकसी―एकसी।

लोल―चंचल।

रास-रमन―रास-क्रीड़ा।

ता―उसका।

गवन―गमन, चलना।

बालगुडी―छोटी गुड्डी (पतंग)।