पृष्ठ:Shri Chandravali - Bharatendu Harschandra - 1933.pdf/७५

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श्रीचन्द्रावली

श्रीचन्द्रावली ७५ अवगाहत-डुब्बी लगाए हुए । पच्छ-पच्छ---पक्ष, जुग पच्छ-अँधेरा और उजेला पाख । प्रतच्छ-प्रत्यक्ष । लुकत-छिप जाता है। अविकल- पूर्ण, ज्यों का त्यों । तितनो-उतना । रजत--चॉदी। चकई --- चक्र । निसिपति-चन्द्रमा । मल्ल-पहलवान । कलहंस-राजहंम । मज्जत-नहाते है। पारावत-कवृतर। कारंडव-हस या बत्तव की जाति का एक पक्षी । जल-कुक्कुट-जल मुर्गी । चक्रवाक-चकवा । पाँवड़े-पायदाज, वह कपड़ा या बिछौना जो आदर के लिए किसी के मार्ग में बिछा दिया जाता है। रत्नरासि-रत्नों का ढेर । कूल-किनारा । बगराए-फैलाए, छितराए । मुक्त-मोती। श्यामनीर-यमुना का जल श्याम होता । चिकुरन-बाल । सतगुन-सतोगुण । सतोगुण का रंग श्वेत माना जाता है । मोट की मोट-गठरी की गठरी । बिलमाई-रुकी रहना या ठहरी रहना (किसी भाव के वशीभूत हो )। जरदी-पीलापन । दुर्बलता, विरह-पीड़ा । छरी सी-छली हुई सी । इसका अर्थ 'छड़ी' भी लिया जा सकता है, अर्थात् छड़ी के समान पतली जो दुर्बलता का चिह्न है । छकी सी-छकी हुई सी (प्रेम में )। जकी सी-चकपकाई हुई सी ।।