पृष्ठ:Shri Chandravali - Bharatendu Harschandra - 1933.pdf/७६

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श्रीचन्द्रावली

७६ श्रीचन्द्रावली जीवति मरी रहै-जीते हुए भी मरी के समान (विरह के कारण)। मुरछि परी रहै-मृच्छित हुई पड़ी रहती है । बाएँ अंग का फरकना-स्त्रियों के लिए शुभ माना जाता है । मान न मान मैं तेरा मेहमान-जबर्दस्ती गले पड़ना। मेरो पिय मोहि बात न पूछे तऊ सोहागिन नाम- जबर्दस्ती किसी परिस्थिति में विश्वास रखना। अतीतन-यतियों, साधुओं । गादी-गद्दी। संसार को जोग तो और ही रकम को है-संसार के जोग (प्रेम) का तो दूमरा ___ ही मूल्य है, अर्थात् लौकिक प्रेम जोगिन के प्रेम से भिन्न है । पचि मरत-हैरान होते है, वृथा बहुत अधिक परिश्रम करते है । धूनी-साधुओं द्वारा अपने सामने लगाई हुई आग | मुद्रा-माधुओं के पहनने का कर्ण भूषण, छला । लट-वालों का गुच्छा, केशपाश । मनका-माला का दाना । अचल-न टूटनेवाली, अडिग । असगुन...चढ़ाना--असगुन की मरति--अपशकुन की मूर्ति, अपशकुन का प्रतीक, राख को शरीर पर कभी न चढ़ाना । तमोल-पान । है पंथ...मत जाना-ऑखों का लग जाना ही हमारा पंथ है अर्थात् प्रेम-पथ । शिवजी से जोगी...सिखाना–यहाँ 'योग' का 'मिलना', 'संयोग' अर्थ है। जीको वेधे डालता है-हृदय को छेदे डालता है । चोटल-चोट खाया हुआ, जख्मी । उपासी---उपासना करनेवाली । डगर-मार्ग, रास्ता। कलेजा ऊपर को खिंच आता है-जी घबराया जाता है। पाहुना-अतिथि । बहाली बता-बहाना कर । आस-सहारा। जो बोले सो घी को जाय-अपनी कही या बताई हुई बात अपने ही सिर पड़ना । अलख गति...प्यारी की-अलख---अगोचर, जो जानी न जा सके। पिया- प्यारी-श्रीकृष्ण और चन्द्रावली ।