पूर्णांक होते हैं। यह मूलभूत सम्बंध
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के अनुसार प्राप्त होता है जिसमें सभी दिक्-जालक बिन्दू इकाई लम्बाई के होते हैं। समय से इसके सम्बंध स्थापित करने के लिए हमें एक मानक घड़ी अपने निर्देश तंत्र अथवा कार्तीय निर्देश तंत्र के मूल बिन्दू (origin) पर रखनी होगी। यदि किसी भी स्थान पर कोई घटना घटित होती है तो हम इसे तीन निर्देशांक और एक समय से लिखते हैं, जैसे ही ही हमने मूल बिन्दू पर घड़ी से समय निर्दिष्ट किया वो घटना के साथ समक्षणिक (युगपत) है। अतएव हम दूरस्थ घटनाओं की समकालिकता के कथन को वस्तुनिष्ट सार्थकता के साथ समझेंगे जबकि पहले हम केवल किसी के व्यक्तिगत दो अनुभवों की समकालिकता की बात करते थे। इस प्रकार सभी घटनाओं के लिए निर्दिष्ट समय हमारे दिक्काश में निर्देश तंत्रों की स्थिति से स्वतंत्र होता है और अतः यह रूपान्तरण समीकरण (3) के सापेक्ष निश्चर होता है।
यह अभिगृहीत है कि आपेक्षिकता से पहले की भौतिकी के नियमों को समझाने वाला समीकरण तंत्र रूपान्तरण समीकरण (3) के सापेक्ष सहपरिवर्ती होता है, जैसा कि यूक्लिडीय ज्यामित के सम्बंध हैं। दिक् की समदैशिकता (isotropy) और समांगता (homogeneity) इस तरह व्यक्ति की जाती है।[१] अब हम इसी दृष्टिकोण से
- ↑ भौतिकी के नियमों को उस स्थिति में भी उल्लिखीत किया जा सकता है जब वो दिक्काश में किसी निश्चित दिशा में इस तरह से हो कि रूपान्तरण (3) के सापेक्ष यह सहपरिवर्ती हो; लेकिन इस स्थिति में ऐसा व्यंजक अनुपयुक्त होगा। यदि दिक्काश में एक अद्वितीय दिशा हो तो प्राकृतिक घटना को सरलता से वर्णित करने वाली दिशा के अनुदिश निर्देश तंत्र को स्थापित किया जा सकता है। लेकिन दूसरी ओर यदि दिक्काश में कोई अद्वितीय दिशा नहीं है तो प्रकृति के नियमों को इस तरह से सूत्रित करना तर्कसंगत नहीं है कि निर्देश तंत्र की तुल्यता से सरल हो जो अलग तरह से विन्यसित किया गया है।
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