दिक् और काल के बारे में कुछ सामान्य टिप्पणियाँ करेंगे। आपेक्षिकता से पूर्व की भौतिकी में दिक् और काल अलग-अलग अस्तित्व में थे। समय से सम्बंधित विनिर्देश निर्देश स्थिति के चयन से स्वतंत्र था। न्यूटनीय यांत्रिकी निर्देश स्थिति के सम्बंध में सापेक्ष थी अतः उदाहरण के लिए यह कथन कि दो असमकालिक (अलग-अलग समय पर) घटनाओं के एक ही स्थान पर होने का कोई वस्तुपरक अर्थ नहीं था (अर्थात् निर्देश स्थिति से स्वतंत्र)। लेकिन इस सिद्धान्त के निर्माण में सापेक्षिकता की कोई भूमिका नहीं थी। यदि कोई काल के क्षणों के रूप में दिक् के बिन्दुओं के बारे में बोलता है जैसे वो अमूर्त वास्तविकतायें हों। यह प्रेक्षित नहीं किया गया कि दिक्-काल के सत्य तत्वों का विनिर्देशन ही घटना था जिसे चार संख्याओं से इसे लिखा जाता है। कुछ होने की अवधारणा हमेशा ही चतुर्विम सांतत्यक होती थी; लेकिन इसकी पहचान आपेक्षिकता से पूर्व के समय में अमूर्थ गुणधर्म के साथ अस्पष्ट थी। काल के अमूर्त गुणधर्म की परिकल्पना, मुख्य रूप से समकालिकता की परिकल्पना को त्यागने के बाद दिक्-काल की चतुर्विमीयता को तुरंत पहचान मिल गयी। यह न ही तो दिक् में कोई बिन्दु है और न ही काल का एक क्षण, जिसपर कुछ घटित होता है जिसकी भौतिक वास्तविकता है लेकिन यह घटना ही है। दो घटनाओं के मध्य न ही तो दिक् में कोई अमूर्त सम्बंध (निर्देश स्थान से स्वतंत्र) होता है और्न ही काल में अमूर्त सम्बंध होता है लेकिन उनमें दिक्-काल में एक अमूर्त (निर्देश स्थान से स्वतंत्र) सम्बंध है, जैसा कि आगे दिखाया जायेगा। किसी भी परिस्थिति में हम चतुर्विम सांतत्यक का त्रिविम दिक् और एकविमीय काल में सांतत्यक विभाजन का कोई वस्तुपरक सम्बंध नहीं है जो इंगित करता है कि प्रकृति के नियम ऐसा रूप ग्रहण करेंगे:3
पृष्ठ:The Meaning of Relativity - Albert Einstein (1922).djvu/४५
दिखावट