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पृष्ठ:The Meaning of Relativity - Albert Einstein (1922).djvu/७४

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आपेक्षिकता का अर्थ

माना जाता है, यह दृष्टिकोण निश्चय ही एकमात्र उचित दृष्टिकोण है। लेकिन इस सामान्य अवधारणा की दो गम्भीर प्रश्न किये जाते हैं। पहला प्रश्न विज्ञान की चिंतन पद्धति के विपरीत है कि हम ऐसी किसी वस्तु (दिक्-काल सांतत्य) की कल्पना करें जो स्वयं क्रिया करता है लेकिन जिस पर क्रिया नहीं की जा सकती। यही कारण था की ई॰ माख (E. Mach) ने यांत्रिकी तंत्र में दिक् को सक्रिय कारण के रूप में हटाने का प्रयास किया। उनके अनुसार कोई भौतिक कण दिक् के सापेक्ष त्वरणहीन गति में नहीं चलता बल्कि ब्रह्माण्ड के अन्य सभी द्रव्यमानों के के केन्द्र के सापेक्ष गति करता है; इस तरह यांत्रिक घटनाओं के कारणों की शृंखला समाप्त हो जाती है जो न्यूटन और गैलीलियो की यांत्रिकी के विपरीत है। इस विचार को आधुनिक "माध्यम के द्वारा क्रिया" (action through a medium) के सिद्धान्त की सीमाओं के भीतर विकसित करने के लिए जड़त्व को निर्धारित करने वाले दिक्-काल सांतत्य के गुणधर्म के स्थान पर क्षेत्र गुणधर्म के रूप में देखा जाता है जो विद्युत्-चुम्बकीय क्षेत्र के समान है। चिरसम्मत यांत्रिकी की अवधारणायें इसे व्यक्त करने का कोई तरीका नहीं देतीं। इसी कारण माख का हल प्राप्त करने का प्रयास अभी के लिए विफल रहा। हम आगे इस दृष्टिकोण पर पुनः चर्चा करेंगे। दूसरे स्थान पर चिरसम्मत यांत्रिकी एक ऐसी सीमा की ओर संकेत करती है जिसके लिए आपेक्षिकता सिद्धान्त को उन निर्देश तंत्रों तक विस्तारित करने आवश्यकता होती है जो एक-दूसरे के सापेक्ष एकसमान गति (uniform motion) में नहीं हैं। यांत्रिकी में दो पिण्डों के द्रव्यमानों के अनुपात को दो तरह से परिभाषित किया जाता है और ये एक दूसरे से मूलभूत रूप से भिन्न होते हैं; पहले में उन्हें (अक्रिय द्रव्यमान inert mass) को गतिज बल से प्राप्त त्वरणों के व्युत्क्रम के अनुपात के रूप में लिखा जाता है और दूसरे में समान गुरूत्वीय क्षेत्र (गुरुत्वीय द्रव्यमान) में उनपर लगने वाले बलों के अनुपात के रूप में लिखा जाता है।