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तुलसी चौरा :: १८७
 


था। आस पड़ोस का कोई भी वहाँ नहीं आया।'

अगले दिन सुबह चार बजे ही कामाक्षी की आँख खुल गयी। इत्तफाक से वह शुक्रवार का दिन था। पार्वती और कुमार सो रहे थे।

कामाक्षी किसी तरह लड़खड़ाती हुई कुँए तक चली आयी। उसे उस वक्त रोकने वाला घर पर कोई नहीं था। सुबह की ठंडी हवा उसके चेहरे को भिगो गयी। चमेली की खुशबू नथुनों में भर गयी। कुँए से खुद पानी खींच कर नहाया।

गहरे नीले रंग की कांजीपुरम् साड़ी पहनी। इसे केवल विशेष उत्सवों में पहना करती थी। गौशाला में जाकर दूध दुहा। बगीचों से फूल ले आयी और उन्हें गूंथ कर। थोड़ा अपने सिर पर लगा लिया, बाकी रख लिया। घर से पुराना चाँदी का थाल निकाला और उसमें आरती घोल ली। द्वार पर पानी छींट कर रंगोली बनायी। पार्वती की आँख खुली। अम्मा को दीयाबाती करते देख चौंक गयी।

'अम्मा! तुम्हें किसने कहा उसे करने को?' हायराम, ठंडे पानी से सिर भी धो लिया! क्यों किया यह सब मैं तो यहीं थी न....?

'चल, तुझे क्या मालूम है। झटपट तुम नहा कर आ जाओ' अम्मा का उत्साह पार्वती के लिये अविश्वसनीय रहा।

कितने दिनों से खाना पीना छूट गया था। दलिया और फल के सिवा कुछ नहीं खाया। पर आज का उत्साह देखते ही बनता था। गृह स्वामिनी की फुर्ती में सारा काम किए जा रही थी। कितना तेज था उसके चेहरे पर। थकी जरूर लग रही थी।

सुबह सूर्योदय के साथ ही नुक्कड़ से नादास्वरम का स्वर सुनाई दिया।

कामाक्षी मे ओसरे से झांका। झुँड में दे लोग घर की ओर वर बधू को लिए आ रहे थे। उत्साह में वह कुछ अधिक ही काम कर रही थी। खंभे का सहारा लेकर खड़ी हो गयी। सिर चकराने लगा, आँखों