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६८ :: तुलसी चौरा
 



रवि, कमली के साथ जब पार्वती और कुमार जाने लगे, श्री... मठ के कारिन्दे ने आकर उन्हें याद दिला दिया। मठ को डाक भी दे गया। बैठक का ध्यान आते ही शर्मा जी को सीमावय्यर की याद आ गयी।

आज चार किसानों को लिये वे जिस तरह जा रहे थे, निश्चित रूप से बैठक से इसका कोई न कोई संबंध होगा। सीमावय्यर बिना किसी काम के यूं भीड़ लगाकर नहीं चलते।

गांवों में इस तरह को बैठकें अमूमन रात आठ बजे शुरू होती हैं, और रात दस ग्यारह तक चलती हैं। किसानों को इसी वक्त फुर्सत मिलती है। शंकरमंगलम में शतप्रतिशत खेतिहर लोगों की आबादी है। बादल धोखा भले ही दे दें, अगत्स्य नदी के तटवर्ती क्षेत्र की जमीन उर्वरा है। मठ की सम्पत्ति के बाग बगीचे, दो तीन गौशालायें, विवाह मंडप, मकान, खाली जमीन, सभी इसी गांव में ही तो थे।

दो तीन वर्ष पहले तक शर्मा जी केवल धार्मिक कार्यों की देख रेख किया करते थे। बटाई की आमदनी, मकान, विवाहमंडप के किराये, उनका हिसाब किताब सब सीमावय्यर के जिम्मे था। काफी घपला होने लगा, शिकायतें भी पहुँची, लिहाजा वह जिम्मेदारी भी शर्मा जी पर आ गयी।

शर्मा जी सीमावय्यर से बैर मोल लेना नहीं चाहते थे। पर कोई दूसरा रास्ता नहीं था। आचार्य ने स्वयं शर्मा जी को बुलवाकर उन्हें इस उत्तरदायित्व को सम्हालने का आदेश दिया। शर्मा से 'न' करते नहीं बना। इसके बाद शर्मा जी और सीमावय्यर के बीच एक दूरी आ गयी। औपचारिकतावश दोनों मिलते थे, पर सीमावय्यर के भीतर आग लगी हुई थी।

ईमानदार व्यक्ति बेईमान और कपटी को एकबारगी क्षमा भी कर देगा पर बेईमान व्यक्ति कतई एक ईमानदार को सहन नहीं कर