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यह गली बिकाऊ नहीं / 149
 


साइन कर रखा है। यह लो।"

मुत्तुकुमरन् पहले जरा झिझका। फिर मन-ही-मन कुछ सोचकर, बिना कुछ आपत्ति उठाये, गोपाल के हाथ से अचानक वह चेक ले लिया। दूसरे क्षण मुत्तुकुमरन् के मुंह से जो सवाल निकला, गोपाल ने उसकी आशा ही नहीं की थी।

"माधवी का क्या हिसाब है? उसे भी अभी देख कर साफ़ कर दोगे?"

"उसका हिसाव पूछनेवाले तुम कौन होते हो?" गोपाल के मुँँह से ऐसे प्रश्न की आशा मुत्तुकुमरन् ने की ही कहाँ थी?

"मैं कौन होता हूँ? मैं ही आज से उसका सब कुछ हूँ। अगले शुक्रवार को गुरुवायुर में मेरा और उसका विवाह है। अब वह तुम्हारे साथ अभिनय भी नहीं करेगी।"

"यह बात तो उसी को मुझसे कहना चाहिए, तुमको नहीं।"

"वह तुम्हारे साथ बात तक नहीं करना चाहती। इसीलिए मैं कह रहा हूँ।"

"मैंने तुम्हें अपना गहरा दोस्त समझकर इस घर में घुसने दिया।"

"मैंने इस दोस्ती के साथ कोई विश्वासघात नहीं किया।"

"अच्छा, तो फिर ऐसी बातें क्यों? एक म्यान में दो तलवारें नहीं समा सकतीं। पांच मिनट ठहरो! माधवी का भी हिसाब साफ़ किये देता हूँ।" कहकर गोपाल ने वहीं से पर्सनल सेक्रेटरी को फोन किया। दस मिनट में वह एक 'चेक लीफ़' के साथ आया। गोपाल ने माधवी के नाम बीस हजार रुपये का एक चेक लिखकर दिया।

"पैसे तो तुमने दे दिये गोपाल! पैसे जरूर दे दिये। लेकिन एक बात याद रखना कि कभी-कभी मनुष्य की मदद रुपयों से आँँकी नहीं जा सकती। इन पैसों को तुम्हारे मुँह पर दे मारने के बदले, इन्हें लेने का एक कारण भी हैं। आज इस दुनिया में रुपयों-पैसों से बढ़कर जो मान-मर्यादा है, उनकी रक्षा के लिए भी पाप में पगे इन रुपयों की बड़ी ज़रूरत पड़ती है। इसी वजह से इस रुपयों का हिसाब करके इन पर अपना हक़ जताकर ले रहा हूँ।"

गोपाल उसकी बातों पर कान न देकर वहाँँ से चल दिया। मुत्तुकुमरन् ने अपना बोरिया-बिस्तर बाँधकर रख लिया। माधवी ने भी उसके काम में उसका हाथ बँटाया। दस-पन्द्रह मिनट में 'आउट हाउस' खाली करके उन्होंने सभी सामान बरामदे पर लाकर रख दिये।

माधवी बोली, "झगड़ा तो मेरे कारण हुआ। मुझे रात को ही घर चला जाना चाहिए था।

"फिर तुम्हारी बातों में भय सिर उठाता-सा मालूम होता है, माधवीं! ऐसा, एक झगड़ा होने के कारण ही तो मैं खुश हो रहा हूँ। लेकिन तुम, ठीक इसके उल्टे नाहक़ चिन्ता करने लग गयी हो। तुम समझती हो कि आगे भी हम इसके साथ