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यह गली बिकाऊ नहीं/51
 


है !" जिल-जिल कुछ इस तरह आश्चर्य करने लगा, मानो हास्य पर प्रतिबंध लगे किसी टापू से आ रहा हो।

जिल-जिल के तन पर धोती और कुरता कुछ इस तरह शोभायमान थे, मानो वे शरीर पर नहीं, 'हंगर' पर लटक रहे हो। हाँ, वह बड़ा दुबला-पतला था ! होंठों पर पान की लाली, उँगलियों में सुलगती सिगरेट, हाथों में उससे कहीं भारी चमड़े का बैग लिये और हल्की-सी कूबड़ के साथ वह इस तरह खड़ा था—जैसे कोई प्रश्न-चिह्न !

"इसने कुरता पहना है या कुरते ने इसे पहना है ?" मुत्तुकुमरन् ने माधवी के कानों में कहा तो वह अपनी हँसी नहीं रोक सकी।

"उस्ताद कौन-सा पटाखा छोड़ रहे हैं ? भी तो मालूम हो !"

गोपाल ने पूछा तो माधवी ने किसी नाटक के हास्य की बात उठाकर बात टाल दी।

"कल आपसे मुलाकात कर मैं "जिल-जिल' में एक भेंट-वार्ता छापना चाहता हूँ। गोपाल साहब' बता रहे थे कि आप बड़े 'जीनियस' हैं।" जिल-जिल ने मुत्तुकुमरन् की खुशामद करनी शुरू कर दी।

थोड़ी देर बाद वे चारों आर्टिस्ट अंगप्पन से मिलने चल पड़े।

अंगप्पन की चित्रशाला चिंतातिरिपे में पुराने ढंग के एक मकान में थी। उसके मातहत चार-पाँच नौसिखुवे काम कर रहे थे। मकान की दीवारों पर सूई भर भी ऐसी जगह नहीं बची थी, जहाँ रंग के धब्बे न लगे हों।

भीड़ से बचने के लिए कार को उस मकान से सटकर खड़ा किया गया और चारों उतरकर अंदर चले आये।

"देखा, अंगप्पन ! तुम्हारे द्वार पर कितना बड़ा मशहूर 'ऐक्टर' लिबा लाया।

हमारे तमिल के महाकवि कवर ने मावंडूर चिंगन के बारे में एक कविता लिखी है कि उसके लोहारखाने में आकर त्रिमूर्ति तपस्या करते हैं कि वह एक अच्छी-सी कलम बना दें ताकि कोई महान् कवि उनकी स्तुति में कालजयी स्तोत्र रच दे। वैसे ही तुम पर भी यह लागू हो सकता है । आज ऐसे. ही बड़े-बड़े आदमी तुम्हारे द्वार पर आये जिल-जिल की इन बातों से लगा कि उन दोनों में कितनी घनिष्ठता है !

कानों में खोंसी हुई पेंसिल से खेलते हुए अंगप्पन ने उनका स्वागत किया।

उसके स्वागत-भाषण में बीते जमाने की कन्हैया कंपनी के स्वर्ण युग के रंगीन सुन्दर दृश्यबंधों से लेकर, चितातिरिपेटे में मिलती रही सस्ती 'काफ़ी' की तस्वीरें तक उभर आयी थीं।

"उन दिनों रामानुजुलु नायुडु की कंपनी में बलराम अय्यर नाम के एक सज्जन थे, जो स्त्री की भूमिका निबाहा करते थे। स्त्री वेश में तो वह हू-ब-हू इन देवी की